ईरान और अमेरिका की लड़ाई में ‘सऊदी अरब’ क्यों पिस रहा है? शुरुआत से लेकर अब तक का पूरा मामला समझिये।

ईरान और अमेरिका की लड़ाई में ‘सऊदी अरब’ क्यों पिस रहा है? शुरुआत से लेकर अब तक का पूरा मामला समझिये।

AshishUrmaliya || Pratinidhi Manthan

14सितंबर को सऊदी अरब के दो तेल व गैस संयंत्रों पर ड्रोन व मिसाइलों से हमले किये गए,दुनियाभर में सुर्खियां बनी, लेकिन पता नहीं चल पाया, कि आखिर हमला किया किसने है।

फिरनवंबर के महीने में एक रिपोर्ट आई जिसमें दावा किया गया, कि अमेरिका को सबक सिखानेके लिए ईरान ने सऊदी अरब के तेल संयंत्रों पर हमला किया गया। जबकि तब तक इस हमले कीजिम्मेदारी हौथी विद्रोही ले चुके थे। आगे बढ़ें, उससे पहले हौथी विद्रोहियों के बारेमें संक्षिप्त रूप से जान लेते हैं। 

हौथीविद्रोही- मध्य-पूर्व (Middle-East) में एक देश है, जो दुनिया के सबसे सूखे, कम विकसितऔर गरीब देशों में से एक है। यमन में लगभग 99 प्रतिशत मुस्लिम रहते हैं, यानी यह पूरीतरह से एक मुस्लिम देश है। यहां भी सिया और सुन्नी के बीच बड़ी लड़ाई है। ज्यादातर मुस्लिमसुन्नी हैं जिनका यमन पर शासन है और इन सुन्नियों के विरोध में जैदी शिया हौथी खड़ेहो गए और गृह युद्ध जैसे हालात पैदा हो गए। देश के भीतर भारी सांप्रदायिक सैन्य विरोधहुआ और तब से ही वहां के हालात गड़बड़ हैं। अब आप कहेंगे कि इससे सऊदी अरब का क्या लेनादेना?

तोहुआ यूँ, कि यमन की सीमा से सटे सऊदी ने सुन्नियों के साथ या कहलें यमन के साथ मिलकरअपनी सीमा पर सैन्य निर्माण करना शुरू कर दिया था, जिसके विरोध में हौथी आ गए। क्योंकियह कार्यवाही हौथियों के विरोध में थी इसलिए हौथी के एक कमांडर ने ऐलान किया, कि जबतक वे सऊदी की राजधानी रियाद पर कब्ज़ा नहीं कर लेते तब तक नहीं रुकेंगे और सऊदी आक्रामकताके खिलाफ लड़ते रहेंगे। तबसे ही इनके बीच तनावपूर्ण हालात बने हुए हैं।     

तो ये तो हुई हौथी विद्रोहियों की बात अब वापस आते हैं ईरान और अमेरिका पर-

रिपोर्टमें खुलासा किया गया है, कि इन हमलों की साजिश ईरान में ही रची गई थी। अरामको, सऊदीअरब पर हमले के करीब चार महीने पहले ईरान के उच्च सैन्य अधिकारियों द्वारा इस साजिश को रचने के लिए उच्चस्तरीय बैठक बुलाईगई थी।

रिपोर्टके अनुसार, इस बैठक में शामिल 4 अधिकारियों द्वारा खुलासा किया गया है, कि बैठक मेंशामिल सभी ईरानी अधिकारी परमाणु संधि से बाहर होने और तेहरान पर प्रतिबंध लागू करनेके लिए अमेरिका को सबक सिखाना चाहते थे। और बैठक में इसी मुद्दे को लेकर चर्चा हुईथी। बैठक में शामिल एक अधिकारी ने नाम उजागर न करने की शर्त पर जानकारी दी, कि बैठकमें ईरान रिवोल्यूशनरी गार्ड के एक बड़े कमांडर ने यहां तक कह दिया था, कि अपनी तलवारेंनिकालने और अमेरिका को सबक सिखाने का वक्त आ गया है। इसके अलावा कई अन्य अफसरों नेभी अमेरिका के ठिकानों को बर्वाद करने की बात कही थी।

औरअंत में इस बात पर जाकर सहमति बनी, कि अमेरिका से सीधे तौर पर उलझने की बजाय उसके किसीबड़े सहयोगी को हानि पहुंचाई जाये। इस बात पर सभी की एक मत से सहमति बनी थी। बताया गयाहै, कि ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खमेनेई ने इस ऑपरेशन पर मुहर लगाई थी,साथ ही किसी नागरिक और खास तौर पर अमेरिकी को निशाना बनाने से बचने की सलाह भी दी थी।जबकि, संयुक्त राष्ट्र में ईरान के प्रवक्ता अलिरेजा मीरयूसफी ने इस खुलासे को सिरेसे नकार दिया है और कहा, कि इस तरह की कोई बैठक नहीं हुई।

यहहमला ईरान ने ही किया है, इसकी एक और वजह यह हो सकती है। ईरान सियाओं की बहुलता वालादेश है और यह दुनियाभर के सिया समुदाय के मुस्लिमों का कट्टर समर्थक है। जबकि सऊदीअरब खुद को सुन्नी मुस्लिम शक्ति की तरह देखता है। यमन में भी सुन्नियों का ही समर्थनकर रहा है। तो कुल मिला कर मान लीजिये इन दोनों शक्तिशाली पड़ोसियों में क्षेत्रीय प्रभुत्वकी लड़ाई चल रही है। लड़ाई का मुख्य कारण सिया-सुन्नी है यानी धार्मिक मतभेद।

चूंकिसऊदी अरब यमन में सियाओं के खिलाफ गतिविधियां करता रहता है, इसलिए ईरान भी सऊदी अरबका दुश्मन बना हुआ है। इसके साथ ही दोनों देश एक दुसरे के खिलाफ आयेदिन साजिशें रचतेरहते हैं।

अमेरिका और सऊदीअरब की नजदीकियां

वक्तथा साल 1945 का अमेरिका के राष्ट्रपति 'फ्रेंक्लिन डी रूजवेल्ट' हुआ करते थे और उसवक्त सऊदी के प्रिंस थे शाह अब्दुल अजीज़। चूंकि, साल 1938 में सऊदी में तेल के बड़ेभण्डार का पता लग चुका था। इसके चलते पूरी दुनिया में सऊदी अरब की तूती बोलने लगी थी।भंडार इतना था, कि पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को हिला दे। बस यही मुख्य कारण था,उससे पहले कि कोई और लपक ले अमेरिका ने सऊदी अरब को मुलाक़ात का न्यौता दे डाला।

1945में इन गहरे संबंधों की नीव डाली गई, जब 'स्वेज नहर' पर अमरीकी नेवी के जहाज पर सऊदीशाह और फ्रेंक्लिन की मुलाकात हुई। सऊदी शाह अमेरिका को सस्ते दामों पर तेल देने केलिए राजी हो गए और इसके बदले में  फ्रेंक्लिनने सऊदी को बहरी दुश्मनों से बचाने का वादा कर दिया।

तेलके बदले सुरक्षा का ये समीकरण 73 साल से हिट है। इसके आड़े अबतक कुछ नहीं आया, सिर्फदो बातों के अलावा,

पहली-  साल 1962 में राष्ट्रपति जॉन एफ केनेडी को मौजूदाराष्ट्रपति फैसल को दास प्रथा बंद कराने के लिए मनाना पड़ा था।

दूसरी-  साल 2015 में राष्ट्रपति बराक ओबामा को सऊदी शाहसलमान को सऊदी की जेल में बंद बदावी को सार्वजानिक रूप से शारीरिक सज़ा न देने के लिएमनाना पड़ा था। बता दें, बदावी को 10 साल की कैद और इस्लाम की तौहीन करने के मामले मेंसार्वजानिक रूप से 1000 कोड़े मारने की सज़ा दी गई थी। आपको बता दें, बदावी को यह सजासिर्फ एक आर्टिकल लिखने की वजह से दी गई है।

वेलेंटाइन डे के दिन दोनों देशों के बीच पनपी ये मोहब्बत अब तक 6 अरब-इजराइली युद्ध झेल चुकी है। जिसमें अमेरिका हर वक्त अरब के साथ खड़ा रहा। 

जिमीकार्टर को अमरीका का पहला ऐसा राष्ट्रपति माना जाता है, जिन्होंने विदेशनीति में मानवअधिकारों को शीर्ष पर रखा। उनके कार्यकाल के दौरान यानी  साल 1977 से ही अमेरिका मानव अधिकारों को लेकर दुनियाभरके देशों की वार्षिक रिपोर्ट तैयार करता आ रहा है, लेकिन इन सभी देशों में सऊदी अरबकभी शामिल नहीं हुआ। क्राउन प्रिंस सलमान के आने के बाद, सऊदी आराम में भरी संख्यामें कई मानव अधिकार कार्यकर्ताओं, महिला अधिकारों के लिए लड़ने वाली महिलाओं और कई वकीलोंको जेल में डाल दिया गया है। लेकिन अमेरिका को यह सब दिखाई नहीं दिया। राष्ट्रपति नेभी पूर्व राष्ट्रपतियों के दिखाए रास्ते का अनुसरण किया।

साल1938 से जबसे सऊदी अरब में तेल के अथाह भंडार का पता लगा है, तबसे ही सऊदी अरब एक ज़िद्दीबच्चे की तरह पूरी दुनिया से अपनी मन मर्जी के काम करा रहा है और अपने देश के भीतरभी कर रहा है। बता दें, अमेरिका और सऊदी अरब के बीच 110 अरब डॉलर का सौदा है, यह अबतक का सबसे बड़ा सौदा है और इस सौदे को रद्द करके अमेरिका मुँह की खाना बिलकुल भी पसंदनहीं करेगा। यही बात ट्रम्प ने भी दोहराई थी, क्योंकि चीन और रूस इस सौदे को लपकनेके लिए तैयार बैठे हैं।

तोये तो रही अमेरिका और सऊदी की यारी। अब तक आपको लगभग सारी समस्या की जड़ समझ आ गई होगीलेकिन और विस्तृत रूप से समझने के लिए अमेरिका और इज़राइल के बीच के मतभेदों का विश्लेषणकर लेते हैं।

अमेरिका-ईरान विवाद

सऊदीअरब तो ईरान का दुश्मन था ही लेकिन उसकी मदद कर-कर के अमेरिका इज़राइल का और भी बड़ादुश्मन बन चुका है लेकिन दुश्मनी का सिर्फ यह एकलौता कारण नहीं है। यह विश्व की सबसेबड़ी दुश्मनी बन चुकी है इस लड़ाई की वजह से पूरा विश्व दो हिस्सों में बंटा हुआ नजरआ रहा है। ऐसा इसलिए क्योंकि अमेरिका ईरान से जितनी नफरत करता है उससे कहीं ज्यादामोहब्बत रूस को ईरान से है। किसी भी विपरीत परिष्तीत्ती में रूस ईरान  उसकी रीढ़ बनकर मजबूती से खड़ा रहता है। तो आइये जानतेहैं, अमेरिका और ईरान के बीच का पूरा विवाद।

मुख्य वजह है परमाणु हथियार- 

समयकी सूइयों को उल्टा घुमाते हुए चलते हैं साल 2006 में जब ईरान ने अपने देश में 5 परमाणुरिएक्टर लगाए थे, जिनमें से एक रिएक्टर को लगाने में रूस ने मदद दी थी। इस बात की जानकारीलगते ही अमेरिका, इजराइल समेत कई देशों का माथा गरम हो गया। हालांकि ईरान अपनी सफाईदेते हुए ये कहता रहा, कि हमने ये रिएक्टर हथियार बनाने के लिए नहीं बल्कि ऊर्जा उत्पन्नकरने के लिए लगाए हैं। लेकिन अमेरिका इस बात पर भरोषा करने के लिए कतई मंजूर नहीं हुआ,उसे हमेशा से शक रहा है कि ईरान चोरी-छिपे परमाणु बम बना रहा है। यह काफी बड़ी जानकारीथी जिसने अब तक तूल पकड़  रखा है.

फिर आया साल 2015-

अमेरिकाऔर इज़राइल के लगातार शक जाहिर करने के चलते ब्रिटेन, जर्मनी और फ्रांस ने ईरान के साथबातचीत शुरू की और फिर तकरीबन 9 साल बाद यानी 2015 में सभी देशों ने मिलकर ईरान केसाथ एक समझौता किया। इस समझौते में बातचीत हुई, कि ईरान में लगे परमाणु रिएक्टर्स कीनियमित रूप से जाँच होगी ताकि पता लग सके, कि वह हथियार नहीं बना रहा है। और इस जाँचके लिए ईरान राजी भी हो गया। इस जांच की जिम्मेदारी अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी(IAEA) को सौंपी गई। यह एजेंसी हर 3 महीने में इन रिएक्टरों की जाँच कर रिपोर्ट तैयारकरती है। लेकिन इज़राइल समझौते  के बाद भी इसेमानने को राजी नहीं था। उसका यही कहना था, कि ये परमाणु प्लांट दुनिया के लिए खतराहैं। लेकिन तत्कालीन राष्ट्रपति ओबामा ने इज़राइल की बात नहीं सुनी और समझौता कर लिया।

फिर आए डोनाल्ड ट्रम्प और हो गई समस्याओं की शुरुआत!

इज़राइलकी तरह ट्रम्प भी बराक ओबामा और अन्य देशों द्वारा ईरान के साथ किये गए समझौते के खिलाफथे। यह समझने के लिए हमें उस बयान को याद करना होगा, जो ट्रम्प ने अपने चुनावी प्रचारके दौरान दिया था। उन्होंने कहा था, कि राष्ट्रपति बराक ओबामा व अन्य 5 देशों द्वाराईरान के साथ किया गया परमाणु समझौता एक दम वाहियात था। प्रचार के दौरान उन्होंने जनतासे वादा भी किया था, कि अगर वे अमेरिका के राष्ट्रपति के रूप में चुने गए तो इस समझौतेको रद्द कर देंगे। और राष्ट्रपति बनने के बाद उन्होंने ऐसा ही किया, 8 मई 2018 को समझौतारद्द कर दिया। हालांकि रूस, फ्रांस, जर्मनी, चीन और ब्रिटेन अभी भी इस समझौते के साथबने हुए हैं।

कुलमिलाकर अमेरिका चाहता है, कि ईरान परमाणु बम न बना पाए और इसीलिए वह अन्य तरीकों सेउसे परेशान करता रहता है। जैसे- व्यापर पर रोक लगाना, अमेरिका में ईरानियों की एंट्रीरोकना, सऊदी अरब और ईरान की सीमा पर अपने सैनिक तैनात करना आदि। हाल ही में ईरान परअमेरिका द्वारा लगाए गए व्यापारिक प्रतिबंधों से वहां की इकॉनमी लड़खड़ा चुकी है और इसीके चलते अमेरिका के ऊपर ईरान का माथा भनका हुआ है। अब आगे क्या होगा इसकी सिर्फ संभावनाएंजताई जा रही हैं, लेकिन ये बात तो तय है कि अगर इन दोनों देशों के बीच युद्ध छिड़ा तोतृतीय विश्ययुद्ध की प्रबल संभावनाएं बन जाएंगी।

Pratinidhi Manthan
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