UP Election 2022: यूपी में ब्राह्मण वोट के लिए चल रही है लड़ाई

उत्तर प्रदेश की राजनीति उफान पर है। पिछले कई दिनों से ऐसे दावे किये जा रहे हैं कि यूपी का ब्राह्मण वोट सरकार से विफरा हुआ है। क्यों विफरा है? इसके पीछे कारण भी बहुत से हैं। विपक्षी दल ब्राह्मणों के खिलाफ किए गए कथित अत्याचारों को उजागर करने में लगे हुए हैं। आपको बता दें, यूपी की कुल आबादी में से लगभग 11% ब्राह्मण ही ब्राह्मण हैं।
UP Election 2022: यूपी में ब्राह्मण वोट के लिए चल रही है लड़ाई

यूपी में लगभग 11 परसेंट ब्राह्मण वोट है। एक तो ख़बरें आ रही हैं कि ब्राह्मण वोटों का एक बहुत बड़ा हिस्सा पहले से ही सरकार से विफरा हुआ है, वहीं दूसरी ओर विपक्षी दल ब्राह्मणों के खिलाफ किए गए कथित अत्याचारों को उजागर करने में लगे हुए हैं। हालांकि सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने ब्राह्मण समुदाय के नेताओं से उनके हित में किए गए कामों की बात करके उन्हें साधने की कोशिश की है।

बहुजन समाज पार्टी (BSP) सर्वोसर्वा मायावती द्वारा 23 जुलाई से ब्राह्मण मिलान समारोह सीरीज की शुरुआत करने की घोषणा के साथ ही 2022 में होने वाले विधान सभा चुनावों से पहले सामुदायिक समर्थन लेने वाले संघर्ष की राजनीति का जन्म हो गया है। 2007 के विधानसभा चुनावों में ब्राह्मणों के समर्थन के बलबूते सरकार बनाने वाली बसपा ने शुक्रवार को पार्टी की पहली ब्राह्मण सभा की व्यवस्था देखने के लिए नकुल दुबे को अयोध्या भेजा था।

मायावती ने पिछले साल घोषणा की थी कि अगर पार्टी सत्ता हासिल करती है तो बसपा भगवान परशुराम के नाम पर अस्पताल स्थापित करेगी।

अयोध्या, 'जहां ध्वस्त बाबरी मस्जिद की जगह राम मंदिर बनाया जा रहा है', ब्राह्मणों की पहली सभा के लिए चुने जाने वाले प्रश्न का जवाब देते हुए नकुल दुबे ने कहा कि "राम ... सभी के हैं।" प्रदेश में बसपा द्वारा आगे भी कई ब्राह्मण सभाएं आयोजित की जानी हैं।

अब कांग्रेस की बात कर लेते हैं...

कांग्रेस नेता आराधना मिश्रा ने कहा कि उनकी पार्टी ही एकमात्र ऐसी पार्टी है जिसने शीर्ष ब्राह्मण मंत्रियों को उत्तर प्रदेश को सौंपा है। उन्हें आश्चर्य है कि क्या कोई राजनीतिक दल ब्राह्मण को प्रमुख मंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करेगा। तो कुल मिलकर कांग्रेस ने भी ब्राह्मणों को रिझाने वाला मोर्चा संभाल लिया है।

2017 के विधानसभा चुनावों में, कांग्रेस ने शुरुआत में दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री, शीला दीक्षित जो कि एक ब्राह्मण थीं, उनको सपा के साथ गठबंधन करने से पहले पार्टी के चेहरे के रूप में चुना था।

आराधना मिश्रा ने जोर देकर कहा कि कांग्रेस जाति की राजनीति में विश्वास नहीं करती है। "यह हमारे डीएनए में नहीं है, लेकिन हम जानना चाहेंगे कि कांग्रेस के अलावा और किस दल ने किसी ब्राह्मण को मुख्यमंत्री पद सौंपा है। स्वर्गीय श्री एन.डी. तिवारी जो एक ब्राह्मण थे उन्होंने 1989 में उत्तर प्रदेश में पिछली कांग्रेस सरकार का नेतृत्व किया था।

अब समाजवादी पार्टी का हिसाब भी जान लीजिए...

समाजवादी पार्टी (SP) के नेता अभिषेक मिश्रा द्वारा समर्थित संगठन भगवान परशुराम ट्रस्ट ने उत्तर प्रदेश के हर जिले में परशुराम मंदिरों का निर्माण शुरू कर दिया है। पौराणिक मान्यता है कि एक ब्राह्मण ऋषि श्री परशुराम भगवान विष्णु के अवतार थे और खासतौर पर ब्राह्मणों का इनके प्रति अत्यंत प्रेम होता है।

अभिषेक मिश्रा ने कहा कि कुछ मंदिर पहले ही बन चुके हैं, जहां पुजारी अनुष्ठान कर रहे हैं। "सभी जिलों में मंदिर बन जाने के बाद, हम भगवान परशुराम की 108 फुट की मूर्ति बनाने की योजना बना रहे हैं।" उन्होंने कहा कि 1993 में सपा सरकार ने परशुराम के जन्मदिन पर छुट्टी की घोषणा की थी।

योगी ने ब्राह्मणों को लपेटने की कैसे कोशिश की... ?

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पिछले साल भगवान् परशुराम को ब्राह्मण के रूप में पेश करने की अपनी चाल के लिए विपक्ष की आलोचना करते हुए कहा था कि "राम और परशुराम दोनों भगवान विष्णु के अवतार थे।"

भाजपा नेता सुनील भराला ने भी घोषणा की है कि ब्राह्मण उनकी राष्ट्रीय परशुराम परिषद के तत्वावधान में बैठक कर रहे हैं।

चुनाव में भाजपा का नेतृत्व करने वाले आदित्यनाथ क्षत्रीय हैं। सपा का चेहरा अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के नेता अखिलेश यादव हैं और दलित मायावती बसपा का। उत्तर प्रदेश में लगभग 9% आबादी का प्रतिनिधित्व क्षत्रिय करते हैं, जबकि सबसे बड़ा वोट बैंक ओबीसी (50%) का है। दलितों और मिस्लिमों की बात करें तो यूपी में उनकी आबादी 20% और 19% हैं।

सभी दलों के बीच उठा पटक जारी है-

असलम रैनी, जो पिछले साल बहुजन समाज पार्टी द्वारा निलंबित किए जाने वाले सात सांसदों में से एक थे, उन्होंने मायावती की रणनीति पर सवाल उठाया है। रैनी ने कहा, “एक समय था जब ब्रजेश पाठक जैसे ब्राह्मण नेता मायावती के साथ थे जो अब सपा का समर्थन करते हैं। मायावती को अब ब्राह्मणों का कोई समर्थन नहीं है।"

ब्रजेश पाठक, जो राज्य सरकार के नौ ब्राह्मण मंत्रियों में से एक हैं। 2004 में बनी बसपा ब्राह्मण सभा के पहले समन्वयक थे, अब समाजवादी पार्टी के साथ हैं।

2017 में, जब भाजपा ने यूपी की 403 सदस्यीय सदन में 312 सीटें जीतीं, तब 58 ब्राह्मण विधायकों ने पार्टी के टिकट पर जीत हासिल की थी। बीजेपी के मात्र ब्राह्मण विधायकों की यह संख्या विधानसभा में सपा (47), बसपा (19) और कांग्रेस (सात) की कुल संख्या से अधिक है।

प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने इस महीने उत्तर प्रदेश के ब्राह्मण अजय कुमार मिश्रा को अपने मंत्रिमंडल में शामिल किया है। आदित्यनाथ के भी अपने मंत्रालय में ब्राह्मण जितिन प्रसाद को शामिल करने की उम्मीद है।

जितिन प्रसाद ने 2020 में आदित्यनाथ सरकार के तहत ब्राह्मणों के खिलाफ किए गए कथित अत्याचारों को उजागर करने के लिए ब्राह्मण चेतना परिषद की स्थापना की। उसके बाद से वह कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हो गए हैं। जितिन का भाजपा में आना काफी मुनाफेदार माना जा रहा है।

भाजपा विधायक उमेश द्विवेदी ने कहा कि उनकी योजना ब्राह्मणों के लिए कई तरह के काम करने की है। जैसे कि, "गरीब ब्राह्मण परिवारों के बच्चों की शिक्षा के लिए पैसा देना, समुदाय के सदस्यों को उनके खिलाफ दर्ज मुकदमों से लड़ने में मदद करना।" द्विवेदी की अखिल भारतीय ब्रह्मोतन महासभा इस पहल का समर्थन करेगी।

इसके अलावा भाजपा सांसद हरीश द्विवेदी ने मायावती के ब्राह्मणों से संपर्क करने के प्रयासों को एक निरर्थक प्रयास बताया। उन्होंने कहा, "ब्राह्मण भाजपा के साथ हैं और 2022 (चुनाव) इसे फिर से साबित करेंगे।"

राजनीतिक पर्यवेक्षक इरशाद इल्मी ने कहा कि सवर्ण जातियों में ब्राह्मण सभी पार्टियों के लिए प्राथमिकता के तौर पर दिखते हैं. "ब्राह्मण समाज को चुनावों में पार्टियों द्वारा पर्याप्त टिकट मिलते हैं तो मुझे कोई आश्चर्य नहीं होगा।"

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