श्यामा प्रसाद मुखर्जी: कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग बनाने के लिए जान न्योछावर कर दी

आज श्यामा प्रसाद मुखर्जी (Shyama Prasad Mukherjee) हमारे बीच होते तो 120 साल के होते। आज पूरा देश श्यामा प्रसाद मुखर्जी की 120 वीं जयंती पूरा देश मना रहा है।
श्यामा प्रसाद मुखर्जी: कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग बनाने के लिए जान न्योछावर कर दी

वैसे तो श्री श्यामा प्रसाद जी बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे, महान क्रांतिकारी थे, प्रसिद्द राजनेता थे। लेकिन जब-जब देश में धारा 370 का ज़िक्र होता है तो श्री श्यामा प्रसाद मुखर्जी का नाम सबसे ऊपर पॉप-अप होता है। अगर कहें कि, धारा 370 ने ही श्यामा प्रसाद मुखर्जी को इतना ज्यादा चर्चित बनाया है तो कुछ गलत नहीं होगा।

डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का जन्म कोलकाता के संभ्रांत (समाज का प्रतिष्ठित वर्ग) परिवार में 6, जुलाई 1901 को हुआ था। उनके पिता श्री आशुतोष मुखर्जी (आशुतोष बाबू) उस समय के प्रख्यात शिक्षाविद् थे. महानता के गुण उन्हें विरासत में ही मिल चुके थे। श्री श्यामा प्रसाद अपने पिता की ही तरह बहुमुखी प्रतिभा धनी थे। मात्र 21 वर्ष की आयु में ही एमए (इंग्लिश) की डिग्री प्राप्त करते ही उनका विवाह 16 अप्रैल 1922 को श्रीमती सुधादेवी से हो गया। विवाह उपरांत उनको दो पुत्र और दो पुत्रियों की प्राप्ति हुई।

पढ़ाई लिखाई में कुछ ज्यादा ही होशियार थे। खासतौर पर गणित विषय में उनका भयंकर मन लगता था। 1923 में उन्होंने एमए (बंगाली की डिग्री प्राप्त की)। इसी वर्ष उन्हें कोलकाता विश्वविद्यालय सीनेट का सदस्य बनाया गया। 1924 में बैरिस्टर ऑफ़ लॉ (BL) की डिग्री प्राप्त की। डिग्री मिलते ही उन्होंने कोलकाता उच्च न्यायलय में वकील के तौर पर खुद एनरोल कराया। बदकिस्मती से इसी वर्ष उनके पिता श्री आशुतोष मुखर्जी का निधन हो गया। लगभग डेढ़ साल बाद 1926 में वे अपने पिता की ही तरह गणित की पढ़ाई करने विदेश चले गए। लंदन की मैथेमेटिकल सोसायटी ने उनको सम्मानित सदस्य बनाया। पढ़ाई पूरी कर के भारत वापस आए और कलकत्ता में ही वकालत तथा विश्वविद्यालय की सेवा में लग गए। ज्ञान और विचारों के इतने धनी थे कि तत्कालित ज्वलंत परिस्थितियों का मिनटों में सटीक विश्लेषण कर दिया करते थे। इसी के चलते उस समय के बुद्धिजीवी भी उनकी प्रतिभा के कायल हो गए थे। 1934 में, जब उनकी उम्र मात्र 33 वर्ष थी, कलकत्ता विश्वविद्यालय के सबसे युवा वाईस चांसलर बने।

डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की राजनीति....

1939, में श्री श्यामा प्रसाद ने राजनीति को अपना कर्मक्षेत्र बनाया और जनसेवा को अपना जीवन बना लिया। श्री मुखर्जी गांधी जी और कांग्रेस नीतियों के विरोधी थे। एक बार उन्होंने अपने वक्तव्य में कहा था कि- 'वो दिन दूर नहीं जब गांधीजी की अहिंसावादी नीति के अंधानुसरण के फलस्वरूप समूचा बंगाल पाकिस्तान का अधिकार क्षेत्र बन जाएगा।' उनका मानना था कि गांधी जी और नेहरू जी तुष्टिकरण की राजनीती करते हैं इसलिए श्री श्यामा प्रसाद उनका हमेशा खुलकर विरोध करते रहे। इसी विरोध के चलते उनको संकुचित सांप्रदायिक विचार का द्योतक समझा जाने लगा जबकि वे असल मायनों में मानवता के उपासक और सिद्धान्तवादी व्यक्तित्व थे।

कुछ ही समय में उन्होंने बहुत से गैर कांग्रेसी हिन्दुओं की मदद से कृषक प्रजा पार्टी के साथ मिलकर एक मजबूत गठबंधन का निर्माण कर लिया। वे लोकसभा सदस्य बने अगस्त,1947 को स्वतंत्र भारत के प्रथम मंत्रिमंडल में एक गैर-कांग्रेसी मंत्री के रूप में उन्होंने वित्त मंत्रालय का काम संभाला। मंत्रालय में रहते हुए उन्होंने विशाखापट्टनम में जहाज बनाने वाला कारखाना, चितरंजन में रेल इंजन का कारखाना और बिहार में खाद का कारखाने स्थापित करवाए। श्री श्यामा प्रसाद के प्रयासों के चलते ही हैदराबाद के निज़ाम को भारत में विलय करने पर मजबूर होना पड़ा था।

फिर आया साल 1950...

1950 में भारत की स्थिति दयनीय थी। कांग्रेस की नीतियों से नाखुश होकर श्री श्यामा प्रसाद जी ने मंत्री पद इस्तीफ़ा दे दिया और संसद में विरोधी पक्ष की भूमिका का निर्वाह करने लगे। राष्ट्रीय एकता की स्थापना करना उनका प्रमुख लक्ष्य था। भारतीय संसद में भी उन्होंने बुलंदी के साथ कहा था कि, 'राष्ट्रीय एकता (National Integrity) के धरातल पर ही भारत के सुनहरे भविष्य की नींव रखी जा सकती है।' फिर साल 1951 में उन्होंने आरएसस प्रमुख एमएस गोवलकर के परमार्श पर 'भारतीय जनसंघ' की स्थापना की।

श्री श्यामा प्रसाद मुखर्जी द्वारा शुरू की गई 'भारतीय जनसंघ' का उद्येश्य सभी हिन्दुओं को सांस्कृतिक रूप से एकजुट करना और उनमें राजनीतिक और राष्ट्रवादी भावनाओं का बीज बोना था। आज जो आधा बंगाल और आधा पंजाब भारत का हिस्सा है, वह श्यामा प्रसाद मुखर्जी की देन है। उन्होंने ही अंग्रेजी सडयंत्र वाले विभाजन के बीच बंगाल और पंजाब के विभाजन की मांग उठाकर प्रस्तावित पाकिस्तान का विभाजन कराया था।

जम्मू एंड कश्मीर...

श्री मुखर्जी शुरुआत से ही कश्मीर में धारा 370 के विरोधी थे। उनका मानना था कि धारा 370 की वजह से भारत की अखंडता और एकता धक्का लगेगा। संसद में उन्होंने इसको हटाने के लिए उन्होंने खूब वकालत भी करी। वे कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग बनाना चाहते थे। उस वक्त कश्मीर का अलग झंडा अलग निशान हुआ करता था। वहां का मुख्यमंत्री वजीरे-आज़म यानि 'प्रधानमंत्री' कहलाता था। श्री श्यामा प्रसाद को एक देश दो झंडे, दो निशान हरगिज स्वीकार नहीं थे। उन्होंने इसके खिलाफ जम्मू की प्रजा परिषद पार्टी के साथ मिलकर भयंकर आंदोलन छेड़ दिया। जनसंघ की स्थापना के कुछ दिनों बाद ही उन्होंने जम्मू का दौरा किया। अगस्त 1952 में जम्मू में विशाल रैली का आयोजन हुआ। उस रैली में श्री मुखर्जी ने अपना संकल्प व्यक्त करते हुए यह तक कह दिया था कि 'मैं आपको भारतीय संविधान का हक़ दिलाऊंगा और इस उद्देश्य की पूर्ति के लिये अपना जीवन बलिदान कर दूंगा।' उस वक्त उन्होंने एक नारा दिया था जो काफी चर्चित रहा- 'एक देश में एक देश में दो प्रधान, दो निशान, दो विधान नहीं चलेंगे, नहीं चलेंगें।'

नेहरू सरकार को चुनौती देते हुए वे अपने दृढ़ निश्चय पर अटल रहे। संकल्प पूर्ती के मकसद से अटलबिहारी वाजपेयी (तत्कालीन विदेश मंत्री), डॉ. बर्मन, वैद्य गुरुदत्त और टेकचंद आदि को लेकर 8 मई 1953 को जम्मू के लिए कूच कर दिया। उस वक्त जम्मू-कश्मीर में प्रवेश पाने के लिए परमिट लेना पड़ता था। श्री श्यामा प्रसाद और उनका दल बिना परमिट के ही अंदर घुस गए। प्रवेश के कुछ समय बाद ही 11 मई, 1953 को उन्हें जम्मू-कश्मीर की शेख अब्दुल्ला (Shekh Abdulla) के नेतृत्व वाली सरकार द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया। डॉ. मुखर्जी 40 दिन तक कैद में रहे। लगभग डेढ़ महीने बाद 23 जून 1953 को श्री श्यामा प्रसाद मुखर्जी की संदिग्ध परिस्थितियों में रहस्यमयी मृत्यु हो गई। मृत्यु के वक्त श्री श्यामा प्रसाद मात्र 51 वर्ष के थे।

बंगाल की धरती से निकले कई महान देश के वीर सपुतों में से एक श्यामा प्रसाद मुखर्जी देश के लिए शहीद हो गए। उन्होंने अपने वचनों को सत्य कर दिखाया। मृत्योपरांत देश भर में कई विश्वविद्यालयों, सड़कों, सरकारी योजनाओं, इमारतों, कस्बों के नाम उनके नाम पर रखे गए। भारतीय सरकार द्वारा उनके नाम पर डाक टिकट भी रिलीज़ किए गए।

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