भारत के दूसरे प्रधानमंत्री: माकन मालिक ने किराया ना मिलने पर इनका सामान बाहर फिंकवा दिया था

महाराष्ट्र सरकार में रहते हुए गुलज़ारी लाल नंदा जी ने इतने अद्भुत काम किए कि स्वयं कांग्रेस आलाकमान ने उन्हें दिल्ली बुला लिया। एक ऐसे व्यक्तित्व, जिन्होंने देश की संकट की घड़ी में कुछ समय के लिए प्रधानमंत्री पद का कार्यभार भी संभाला, आज़ादी के बाद प्रथम पांच आम चुनावों में लगातार लोकसभा के सदस्य निर्वाचित हुए।
भारत के दूसरे प्रधानमंत्री: माकन मालिक ने किराया ना मिलने पर इनका सामान बाहर फिंकवा दिया था

भारत के दूसरे प्रधानमंत्री श्री गुलजारीलाल नंदा का जन्म 4 जुलाई 1898 को सियालकोट, पंजाब, पाकिस्तान में हुआ था। ये सेन परिवार से ताल्लुक रखते थे जो अब पश्चिमी पाकिस्तान का हिस्सा है। इनकी माता श्रीमती ईश्वर देवी नंदा और पिता श्री बुलाकी राम नंदा जी थे। गुलजारीलाल जी ने सियालकोट में ही अपनी प्राथमिक शिक्षा प्राप्त की। इसके बाद उन्होंने लाहौर के 'फ़ोरमैन क्रिश्चियन कॉलेज' में स्नातक डिग्री प्राप्त की। आगे की शिक्षा आगरा एवं इलाहाबाद विश्वविद्यालय से प्राप्त की। उन्होंने कला संकाय में स्नातकोत्तर एवं क़ानून की स्नातक उपाधि प्राप्त की, फिर इलाहाबाद विश्वविद्यालय (1920-1921) में ही श्रम संबंधी समस्याओं पर एक शोध अध्येता के रूप में कार्य किया। इसके उपरांत साल 1921 में नेशनल कॉलेज (मुंबई) में अर्थशास्त्र के प्राध्यापक बनाए गए। इसी वर्ष वे साल 1920 में महात्मा गांधी द्वारा शुरू किए गए असहयोग आंदोलन में शामिल हुए।

सरलता को परिभाषित करने वाले श्री गुलज़ारी लाल नंदा जब 18 वर्ष के थे, तभी साल 1916 में उनका विवाह लक्ष्मी देवी के साथ सम्पन्न हुआ। इसके बाद इनके परिवार में दो पुत्र और एक पुत्री सम्मिलित हुई।

आगे का जीवन ऐतिहासिक रहा!

बहुमुखी प्रतिभा के धनी श्री गुलज़ारी लाल नंदा का भारत के स्वाधीनता संग्राम में महत्वपूर्ण योगदान रहा। इनका पूरा जीवन शुरुआत से ही राष्ट्र के प्रति समर्पित था। असहयोग आंदोलन के सक्रिय सदस्य रहे, मुंबई के नेशनल कॉलेज में अर्थशास्त्र के व्याख्याता के रूप में अपनी सेवाएं दीं। साल 1922 से लेकर 1946 तक वे अहमदाबाद टेक्सटाइल लेबर एसोसिएशन के सचिव रहे, इस सेवा के दौरान भी उन्होंने अपना सर्वस्व दिया।

देश के लिए कई बार जेल भी जाना पड़ा-

सत्याग्रह आंदोलन के चलते साल 1932 में उन्हें जेल जाना पड़ा। इसके बाद साल 1942 से लेकर 1944 तक वे जेल में ही रहे।

राजनीतिक जीवन कुछ इस तरह रहा-

गुलज़ारी लाल नंदा साल 1937 में बंबई विधान सभा कांग्रेस से विधायक चुने गए, 1939 तक इस पद पर रहे। साल 1937 से 1939 तक वे बंबई सरकार के संसदीय सचिव (श्रम एवं उत्पाद शुल्क) भी रहे। इसके बाद, साल 1946 से 1950 तक फिर बंबई सरकार में विधायक व श्रम मंत्री का कार्यभार संभाला। इसी सत्र के दौरान उन्होंने श्रम मंत्री के रूप में राज्य विधानसभा में सफलतापूर्वक श्रम विवाद विधेयक पेश किया था। साल 1947 में 'इंडियन नेशनल ट्रेड यूनियन कांग्रेस' की स्थापना हुई और इसका पूरा श्रेय नंदाजी को ही जाता है। नंदा जी ने कस्तूरबा मेमोरियल ट्रस्ट में न्यासी के रूप में काम किया, हिंदुस्तान मजदूर सेवक संघ में सचिव की भूमिका निभाई, इसके अलावा 'बाम्बे आवास बोर्ड' में अध्यक्ष का कार्यभार भी निष्ठा से संभाला। गुलज़ारी लाल राष्ट्रीय योजना समिति के सदस्य भी रहे। जब राष्ट्रीय मजदूर कांग्रेस का आयोजन हुआ, तब इस आयोजन में नंदा जी की महत्वपूर्ण रही थी। इसके बाद उन्होंने राष्ट्रीय मजदूर कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में भी कार्यभार संभाला।

इतना काम किया कि केंद्र सरकार को दिल्ली बुलाना पड़ा-

महाराष्ट्र सरकार में रहते हुए गुलज़ारी लाल नंदा जी ने इतने अद्भुत काम किए कि स्वयं कांग्रेस आलाकमान ने उन्हें दिल्ली बुला लिया। नंदा की प्रतिभा को रेखांकित करते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इन्हें अपना ख़ास बना लिया था। श्री नंदा ने 1950-1951, 1952-1953 और 1960-1963 में भारत के योजना आयोग के उपाध्यक्ष पद का कार्यभार संभाला। देश में नेहरू जी के ड्रीम प्रोजेक्ट 'पंचवर्षीय योजना' में भी गुलज़ारीलाल नंदा का काफी अहम योगदान रहा।

अपने इन कार्यकालों के दौरान गुलज़ारीलाल नंदा ने कई पदों को सुशोभित किया और महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। श्री नंदा केन्द्रीय मंत्रिमण्डल में कैबिनेट मंत्री रहे और स्वतंत्र मंत्रालयों का कार्यभार भी संभाला। नंदा जी ने योजना मंत्रालय का कार्यभार सितंबर 1951 से लेकर मई 1952 तक भलीभांति संभाला।

साल 1952 के आम चुनाव में बंबई से लोक सभा के लिए चुने गए। सांसद बनते ही उन्हें मंत्री पद दे दिया गया, इसके उपरांत उन्होंने मई 1952 से जून 1955 तक योजना आयोग एवं नदी घाटी परियोजनाओं का कार्य भी देखा।

साल 1947 में गुलज़ारी लाल जेनेवा में हुए अंतरराष्ट्रीय श्रम सम्मेलन (International labor conference) में एक सरकारी प्रतिनिधि के रूप में भारत सरकार द्वारा भेजे गए। सम्मेलन द्वारा उन्हें ‘द फ्रीडम ऑफ़ एसोसिएशन कमेटी’ के सदस्य के रूप में नियुक्ति दी गई। उन्होंने द फ्रीडम ऑफ़ एसोसिएशन कमेटी के सक्रिय सदस्य के रूप में कार्य किया, इसके साथ ही उन्होंने फ्रांस, स्वीडन, स्विट्जरलैंड, बेल्जियम एवं इंग्लैंड जैसे देशों का दौरा किया ताकि वे उन देशों में श्रम एवं आवास की स्थिति का गहन अध्ययन कर सकें।

श्री गुलज़ारी लाल नंदा जी 1957 के आम चुनाव में एक बार फिर लोकसभा के लिए सांसद चुने गए, फिर सरकार ने उन्हें श्रम तथा रोजगार, ऊर्जा और नियोजन के केंद्रीय मंत्री पद की ज़िम्मेदारी सौंपी। अप्रैल 1957 से 1967 तक उन्होंने इन सभी मंत्रालयों की ज़िम्मेदारी संभाली इसके साथ ही वे योजना आयोग के उपाध्यक्ष रहे। साल 1959 में उन्होंने जर्मन संघीय गणराज्य, ऑस्ट्रिया एवं यूगोस्लाविया जैसे देशों का भी दौरा किया।

दो बार प्रधानमंत्री बने, अचानक बने और दोनों बार 13 -13 दिन के लिए बने-

साल 1962 में भारत में फिर आम चुनाव हुए। इस बार गुलज़ारी लाल नंदा गुजरात के साबरकांठा निर्वाचन क्षेत्र से चुनाव लड़े और एक बार फिर लोकसभा के लिए निर्वाचित हुए। इसके उपरांत उन्होंने इसी वर्ष समाजवादी लड़ाई के मकसद से कांग्रेस फोरम की शुरूआत की। साल 1962 एवं 1963 में उन्होंने केंद्रीय श्रम एवं रोजगार मंत्री का कार्यभार संभाला। फिर साल 1963 से लेकर 1966 तक गृह मंत्री रहे। नेहरू जी गुलज़ारी लाल नंदा जी की योग्यता के इतने कायल थे कि अपने लगभर हर फैसले के पहले गुलज़ारी लाल जी से ही सलाह-मशविरा किया करते थे।

27 मई 1964 को पंडित नेहरू की मृत्यु के बाद उन्होंने भारत के प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली और करीब 13 दिन कार्यवाहक प्रधानमंत्री के रूप में काम किया। इसके बाद कांग्रेस पार्टी के तत्कालीन अध्यक्ष कुमारस्वामी कामराज ने श्री लाल बहादुर शास्त्री जी को देश का प्रधानमंत्री बनाने का प्रयास किया और वे सफल भी हुए। लेकिन 11 जनवरी 1966 को ताशकंद में श्री लाल बहादुर शास्त्री की अचानक मृत्यु के बाद फिर से श्री गुलज़ारी लाल जी ने प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली। इस बार फिर उन्होंने इस पद का कार्यभार मात्र 13 दिनों के लिए ही संभाला।

मकान मालिक ने सामान बाहर फिंकवा दिया था-

एक ऐसे व्यक्तित्व, जिन्होंने देश की संकट की घड़ी में कुछ समय के लिए प्रधानमंत्री पद का कार्यभार भी संभाला, आज़ादी के बाद प्रथम पांच आम चुनावों में लगातार लोकसभा के सदस्य निर्वाचित हुए। कई महत्वपूर्ण मंत्रालयों का कार्य संभाला, लेकिन फिर भी जीवन भर किराये के साधारण से मकान में रहे। यह किस्सा बहुत प्रचलित है, जब एक बार श्री गुलज़ारी लाल नंदा जी अपने मकान का किराया नहीं दे पाये थे, तब मकान मालिक ने उनका सामान बाहर फिंकवा दिया था। बैंक में भी वे अपने पीछे मात्र दो हजार चार सौ चौहत्तर रुपये ही छोड़ गए थे। नंदा दीर्घायु हुए और 100 वर्ष की आयु में इनका निधन 15 जनवरी 1998 को हुआ। इन्हें एक स्वच्छ छवि वाले गांधीवादी राजनेता के रूप में सदैव याद रखा जाएगा।

कई पुस्तकें रचीं, भारत रत्न से भी सम्मानित हुए-

गुलज़ारी लाल नंदा जी ने अपने व्यस्त राजनैतिक जीवन से समय निकाल कर एक लेखक की भूमिका भी अदा की। उन्होंने कई पुस्तकों की रचना की, जिनके नाम इस प्रकार हैं- सम आस्पेक्ट्स ऑफ़ खादी, अप्रोच टू द सेकंड फ़ाइव इयर प्लान, गुरु तेगबहादुर, संत एंड सेवियर, हिस्ट्री ऑफ़ एडजस्टमेंट इन द अहमदाबाद टेक्सटाल्स, फॉर ए मौरल रिवोल्युशन तथा सम बेसिक कंसीड्रेशन। नन्दा जी को देश का सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न (1997) और दूसरा सर्वश्रेष्ठ नागरिक सम्मान पद्म विभूषण भी प्रदान किया गया। वे साधारण व्यक्तित्व वाले असाधारण इंसान थे।

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