मासूम चेहरे के पीछे भयंकर तेज़ दिमाग: दसवें प्रधानमंत्री पी वी नरसिम्हा राव

17 भाषाओँ का ज्ञान रखने वाले देश के 10वें प्रधानमंत्री श्री पी.वी. नरसिम्हा राव (PV Narasimha Rao) के सख्त फैसलों ने देश को घाटे से उबारा था। उन्हें टेक्नोलॉजी से इतना लगाव था कि उस दौर में 65 की उम्र में कंप्यूटर चलाना सीख लिया। आइए भारत की तस्वीर बदलने वाले शख्स के बारे में पढ़िए...
मासूम चेहरे के पीछे भयंकर तेज़ दिमाग: दसवें प्रधानमंत्री पी वी नरसिम्हा राव

90 का दशक अपनी ब्रह्मचर्य अवस्था में था और इसको गृहस्थ अवस्था तक पहुंचाने की ज़िम्मेदारी पीवी नरसिम्हा राव के कंधों पर थी। बात 1991 की है। एक आत्मघाती बम विस्फोट में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या कर दी गई। उनके बाद प्रधानमंत्री की ज़िम्मेदारी संभालने को लेकर खूब झमेला हुआ, कई नेताओं ने प्रधानमंत्री बनने के लिए एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा दिया था। लेकिन बाद में वरिष्ठ कांग्रेसी नेताओं के समर्थन से पी.वी. नरसिम्हा राव को 21 जून 1991 को देश की सत्ता सौंप दी गई। श्री राव देश के दसवें और साउथ इंडिया से आने वाले पहले प्रधानमंत्री बने। हालांकि वो दौर सत्ता सुख भोगने वाला नहीं था क्योंकि देश अनेकानेक चुनौतियों का सामना कर रहा था।

शुरुआत से शुरू करते हैं...

पीवी नरसिम्हा राव का जन्म 21 जून 1991 को तब के हैदराबाद और आज के तेलंगाना के वरंगाल रूरल डिस्ट्रिक्ट के 'लक्नेपल्ली गांव' के तेलुगु भाषी नियोगी ब्राह्मण परिवार में हुआ था। 3 साल की उम्र में उन्हें गॉड ले लिया गया और वरंगाल अर्बन डिस्ट्रिक्ट के वनगरा गांव ले आये गए। उनके पिता पी. एस. राव और माता पामुलापर्थी रुक्मिणी कृषक थे। पी.वी. की की शुरूआती शिक्षा पास के ही कटकुरु गांव में संपन्न हुई, यहां वे अपने एक रिश्तेदार के यहां रहकर स्कूल जाया करते थे। बाद में स्नातक की पढ़ाई हैदराबाद के उस्मानिया विश्वविद्यालय से प्राप्त की। फिर उन्होंने तब के पुने, आज के मुंबई के बॉम्बे विश्वविद्यालय से कानून की पढ़ाई पढ़ी। इसी बीच उनकी शादी भी हो चुकी थी जिसके बाद उन्हें तीन बेटे और पांच बेटियों की प्राप्ति हुई।

भारतीय आर्थिक सुधारों के जनक... बनने तक की कहानी

श्री राव भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के सक्रिय स्वतंत्रता सैनानी थे। भारत को आज़ादी मिलने के बाद भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की सदस्यता ले कर फुल टाइम राजनीति में आ गए। 1957 से 1977 तक एक निर्वाचित प्रतिनिधि (विधायक) के रूप में आंध्र प्रदेश राज्य विधानसभा के लिए काम किया। 1962 से 1973 तक राज्य में विभिन्न मंत्री पदों (सूचना, कानून, चिकित्सा, शिक्षा, आदि) को संभाला। फिर 1971 में वे आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। अपने शासन काल में उन्होंने भूमि सुधार और भूमि सीलिंग अधिनियमों को सख्ती से लागू किया था। इसी दौरान उन्होंने राजनीति में निचली जातियों के लिए आरक्षण की पॉलिसी भी पारित करवाई। उन्हीं के कार्यकाल के दौरान ही आंध्रा में जय आंध्र आंदोलन चलाया जा रहा था जिसे काउंटर करने के लिए प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगने तक की नौबत आ गई थी।

1969 में जब इंदिरा गांधी ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को खंडित कर नयी कांग्रेस पार्टी का गठन किया था तब श्री राव ने उनका पुरजोर समर्थन किया था। 1972 में श्री राव आंध्र प्रदेश के एक लोकसभा क्षेत्र से निर्वाचित हुए। राष्ट्रीय राजनीति में कद बढ़ता गया, इंदिरा और फिर उनके बेटे राजीव गांधी के नेतृत्व वाली सरकारों में उन्होंने गृह, रक्षा एवं विदेश जैसे बड़े मंत्रालयों की ज़िम्मेदारी संभाली। विदेश मंत्रालय की ज़िम्मेदारी उन्होंने 1980 से 1984 तक और फिर 1988 to 1989 तक संभाली। ऐसा कहा जाता है कि 1982 में वे ज्ञानी ज़ैल सिंह के साथ भारत के राष्ट्रपति पद की रेस में भी शामिल थे। हालांकि बाद में ज्ञानी जेल सिंह जी ही देश सातवें राष्ट्रपति बने थे।

1991 में श्री राव राजनीति से लगभग सन्यास ले ही चुके थे तभी देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री राजीव गांधी की हत्या कर दी गई। और फिर पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने उन्हें प्रधानमंत्री के रूप में अपना नेता चुन लिया। देश की आर्थिक स्थिति बेहद नाजुक दौर से गुजर रही थी। प्रधानमंत्री पद की ज़िम्मेदारी बहुत चुनौतीपूर्ण था। लेकिन राव ने प्रधानमंत्री पद की शपथ लेते ही अपना करिश्मा दिखाना शुरू कर दिया।

राव और मनमोहन की ऐतिहासिक जोड़ी का दौर शुरू...

कांग्रेस पार्टी की ओर से नेहरू-गांधी परिवार से हट हर वो पहले व्यक्ति थे जो प्रधानमंत्री बने और लगातार 5 वर्षों तक प्रधानमंत्री के तौर पर अपनी सेवाएं दीं। राव ने उस बार लोकसभा का चुनाव नहीं लड़ा था लेकिन प्रधानमंत्री बन चुके थे इसलिए उन्होंने आंध्र प्रदेश की नाड्याल लोकसभा सीट से उपचुनाव लगा और 5 लाख वोटों से ऐतिहासिक जीत हासिल की। श्री राव की यह जीत उस वर्ष के गिनीज़ बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड (Guinness World Records) में दर्ज की गई थी। श्री राव ने अपनी सरकार में शरद पवार (जो उन दिनों प्रधानमंत्री पद के प्रबल दावेदारों में से एक थे) को रक्षा मंत्री बनाया। राजनीति की परंपरा को तोड़ते हुए और भारी विरोध के बावजूद उन्होंने एक गैर-राजनैतिक अर्थशास्त्री श्री मनमोहन सिंह जी को देश का वित्त मंत्री बना दिया। और तो और विपक्षी दल के नेता सुब्रमण्यम स्वामी जी को श्रम मानक और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार आयोग का अध्यक्ष बना दिया। उनका यह फैसलाराजनीति की दुनिया का सबसे चौकाने वाला फैसला था क्योंकि उन्होंने विपक्षी दल के नेता को कैबिनेट रैंक का पद दे दिया था। ये सब तो छोड़िये, उन्होंने जिनेवा में संयुक्त राष्ट्र की बैठक में भारत का प्रतिनिधित्व करने के लिए विपक्षी नेता अटल बिहारी वाजपेयी को भेजा था। श्री राव के इन्हीं सब (राजनीति के इतिहास में पहले और चौंकाने वाले) फैसलों ने उन्हें एक महान राजनीतिज्ञ की उपाधि दिलाई।

जब श्री राव प्रधानमंत्री बने तब ऐसा दौर था कि हमारे देश को अपना सोना विदेशों में गिरबी रखना पड़ रहा था। हमारा विदेशी मुद्रा भंडार लगभग ख़त्म था। उन दिनों हमारे पास 2500 करोड़ रुपये का भंडार था जो बमुश्किल तीन महीने ही चल पाता। निजी कंपनियां गिनी-चुनी थीं इसलिए नौकरियां भी नहीं थीं। सरकारी दफ्तरों में भी उतनी नौकरियां नहीं थीं। पढ़े-लिखे लोग बेरोजगार थे। विदेशी मुद्रा भंडार की कमी का असर सीधे तौर पर देश की आम जनता पर पड़ता दिखाई दे रहा था। फिर श्री राव और मनमोहन सिंह जी की जोड़ी ने अपना कमाल दिखाना शुरू किया।

श्री राव ने दुनिया (ग्लोबल कंपनियों) के लिए देसी बाजार खोल दिया, भारी आलोचना हुई लेकिन वो अपने फैसले से डिगे नहीं। उनके इसी फैसले की वजह से आज भारत दुनिया के टॉप देशों की श्रेणी में शामिल है। विदेशी कंपनियों के देश में आते ही न सिर्फ औद्योगिकीकरण को बढ़ावा मिला बल्कि भरपूर मात्रा में रोजगार पैदा हुआ और घरों में संपन्नता आने लगी। राव और मनमोहन की जोड़ी का सबसे बड़ा लक्ष्य राजकोषीय घाटे को कम करना था। राव ने सख्त फैसलों की लाइन लगा दी, बड़े-बड़े राजनीतिक पंडितों के दिमाग चकचौंधिया गए कि आखिर ये चल क्या रहा है। कुछ दिनों के भीतर ही विदेशी मुद्रा भंडार भरने लगा।

घोटाले वाले आरोप भी बहुत लगे-

आज आप जिन्हें 'BIG BULL' के नाम से जानने लगे हैं, उन स्टॉक मार्केट स्कैम में घिरे हर्षद मेहता ने श्री राव पर 1 करोड़ की रिश्वत लेने का आरोप लगाया था। आज भी वह घोटाला जिसे 'सूटकेस घोटाले' के नाम से जाना जाता है, चर्चा का विषय बना हुआ है। इसके बाद पी.वी. सरकार पर एक के बाद एक बहुत से घोटाले के आरोप लगे। लेकिन सभी में उनको क्लीनचिट मिली। उनके खिलाफ साबित कुछ भी नहीं हुआ लेकिन घोटाले चर्चा का विषय बन गए।

भाषाओं और कंप्यूटर में बहुत दिलचस्पी थी

श्री राव की विज्ञान में बहुत रूचि थी। यही कारण रहा कि उनका झुकाव टेक्नोलॉजी की तरफ गया। गांव में जब बिजली नहीं हुआ करती थी तब वे ऑइल इंजन की खुद ही मरम्मत कर लिया करते थे ताकि प्रकाश हो सके। आयल इंजन से लेकर कंप्यूटर तक उनका रुझान टेक्नोलॉजी में हमेशा बना रहा। 65 की उम्र में उन्होंने खुद से ही कंप्यूटर चलाना सीखा था। हालांकि शुरुआत में एक टीचर की सहायता ली लेकिन उन्हें वो टीचर पसंद नहीं आये और फिर उन्होंने खुद किताबों की मदद से कंप्यूटर सीखा। छः महीने की दिन-रात मेहनत से उन्होंने कंप्यूटर सीखा, सामान्य कंप्यूटर चलना नहीं बल्कि उन्होंने प्रोग्रामिंग और कोडिंग भी सीख ली थी। 82 की उम्र में उन्होंने डीटीपी और फॉन्ट की जानकारी प्राप्त की थी। उन्हें कंप्यूटर की इतनी गहरी जानकारी हो चुकी थी कि बड़े-बड़े जानकर भी उनके आगे पानी भरते से दिखाई पड़ते थे। पूर्व प्रधानमंत्री मनोहन जी ने बताया, "मुझे कंप्यूटर की जानकारी नहीं थी इसलिए श्री राव हमेशा मुझे इसको लेकर छेड़ा करते थे।" श्री राव ने अपनी आत्मकथा 'द इनसाइडर' भी कंप्यूटर पर ही लिखी थी। वे अपने भाषण और लेख भी कंप्यूटर पर ही तैयार किया करते थे। किताबों के बाद कंप्यूटर उनका सबसे अच्छा मित्र बन चुका था। अपनी मौत के 15 दिन पहले तक उनका सबसे ज्यादा वक्त कंप्यूटर पर ही बीतता रहा।

इसके साथ ही उन्हें संगीत से भी कुछ ज्यादा ही प्रेम था। युवा अवस्था में उन्होंने शास्त्रीय संगीत सीखा था। एक वाकया है, जब श्री राव की उंगलियों में तकलीफ होनी शुरू हो गई। डॉक्टर ने उन्हें एक बॉल देकर एक्सरसाइज करने को कहा। एक दो दिन बॉल से एक्सरसाइज की, उन्हें मज़ा नहीं आया। बॉल को फेंक श्री राव 'म्यूजिकल कीबोर्ड' पर अपनी उंगलियां चलाने लगे। पहले भी कभी-कभार कीबोर्ड अभ्यास किया करते थे लेकिन उंगलियों में दिक्कत आने के बाद जब उन्होंने अभ्यास शुरू किया और इसमें भी महारथ हासिल कर ली। उन्होंने इसका इस हद तक अभ्यास कर लिया था कि अपनी मौत के 6 महीने पहले संगीत कार्यक्रम में हिस्सा लेने की इच्छा तक ज़ाहिर कर दी थी।

श्री राव भाषाओं की जानकारी के मामले में भी बहुत प्रचलित थे। कहा जाता है उन्हें 17 भाषाओं की जानकारी थी। इन 17 भाषाओं में कई भारतीय भाषाओं के साथ अंग्रेजी, स्पेनिश, फारसी, जर्मन, ग्रीक, लैटिन और फ्रांसीसी भाषा भी शामिल है। इतनी भाषाओँ की जानकारी विरले ही लोगों को होती है।

मनमोहन सिंह श्री राव को मृत्यु उपरांत भारत रत्न देने के पक्ष में थे लेकिन...

आर्थिक सुधारों के जनक श्री राव को कांग्रेस पार्टी ने कभी तवज्जो नहीं दी। उनके प्रधानमंत्री वाले कार्यकाल के बाद पार्टी ने उनसे किनारा कर लिया। यहां तक कि खुद राव ने भी 10 जनपथ जाना बंद कर दिया था। कांग्रेस नेता केवी थॉमस ने भी अपनी किताब 'सोनिया- द बीलव्ड ऑफ द मासेज' में इस बात का ज़िक्र किया है, कि सोनिया-राव के बीच रिश्ते सामान्य नहीं थे। राव ने थॉमस से कई बार इस बात का ज़िक्र किया था कि प्रधानमंत्री कार्यकाल ख़त्म होने के बाद सोनिया उनका अपमान किया करती थीं। कई बार 10 जनपथ बुलवाकर राव से लंबा इंतज़ार करवाया जाता था। इस तरह के अपमान का उनकी सेहत पर भी बुरा असर पड़ रहा था। 23 दिसंबर 2004 को जब राव की मृत्यु हुई तब उनका शव कांग्रेस कमेटी के बाहर रखा गया था। उस शव को अंदर रखने की इजाज़त नहीं दी गई थी। श्री राव की मृत्यु के बाद भी जब कांग्रेस अपनी उपलब्धियां गिनवाती थी, उनमें राव का कभी भी जिक्र नहीं होता था। हालांकि बीते वर्ष पहली बार सोनिया ने सार्वजानिक तौर पर श्री राव की तारीफ की थी। माना जाता है कि श्री राजीव गांधी की हत्या के बाद जब राव को प्रधानमंत्री पद मिला तभी से सोनिया और राव के बीच कुछ आतंरिक मतभेद पैदा हो गए थे।

पूर्व प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह जी भी अपने कार्यकाल के दौरान श्री राव को भारत रत्न देने के पक्ष में थे लेकिन ऐसा हो नहीं पाया।

Pratinidhi Manthan
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