बुंदेलखंड के सुप्रसिद्ध कवि 'झटपट' जी से ख़ास बातचीत!

श्री रामकुमार पाण्डेय 'झटपट' ने बचपन से ही लिखना शुरू कर दिया था और आज भी विभिन्न विधाऒं (हास्य, व्यंग, गीत, छन्द आदि) की रचनाएं लगातार कर रहे हैं। इनकी बहुत सी रचनाएं बेहद लोकप्रिय हुईं, जिनकी वजह से इन्हें अनेक संस्थाओं द्वारा क्षेत्रीय व राष्ट्रीय स्तर पर कई बार सम्मानित किया गया।
बुंदेलखंड के सुप्रसिद्ध कवि 'झटपट' जी से ख़ास बातचीत!
RamKumar Pandey

देश के जाने-माने वरिष्ठ कवि पं. श्री राम कुमार पाण्डेय (झटपट) जी से हुई हमारी खास बातचीत को आप आगे पढ़ेंगे, लेकिन उससे पहले उनकी निजी जिंदगी से जुड़ी कुछ बातें जान लेते हैं...

कवि पं. श्री राम कुमार पाण्डेय जी 'झटपट' का जन्म मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले के अंतर्गत आने वाले ग्राम- समोहा में 12 दिसंबर 1959 को हुआ था। इनकी माता स्व. श्रीमती देशरानी और पिता स्व. श्री श्यामलाल पाण्डेय जी थे। श्री रामकुमार जी के पिता जी श्री श्यामलाल जी पाण्डेय ज्योतिष के विशेष ज्ञाता थे। रामकुमार जी शुरुआत से ही जिज्ञासू प्रवृति के थे, पाण्डेय जी ने शुरुआती शिक्षा ग्राम समोहा और तहसील करैरा से ही प्राप्त की। इसके उपरांत स्नातक की पढाई करने शासकीय महाविद्यालय मध्य प्रदेश (दतिया) चले गए, फिर दो साल की तकनीकी शिक्षा शिवपुरी मध्यप्रदेश से प्राप्त की और अपने गांव के तीसरे सबसे पढ़े लिखे व्यक्ति बने। इसी तकनीकी शिक्षा की बदौलत इनको शासकीय कंपनी Bharat Heavy Electricals Limited (BHEL) में तकनीकी विभाग में सेवा देने का अवसर प्राप्त हुआ।

श्री पाण्डेय ने बचपन से ही लिखना शुरू कर दिया था और आज भी विभिन्न विधाऒं (हास्य, व्यंग, गीत, छन्द आदि) की रचनाएं लगातार कर रहे हैं। इनकी बहुत सी रचनाएं बेहद लोकप्रिय हुईं, जिनकी वजह से इन्हें अनेक संस्थाओं द्वारा क्षेत्रीय व राष्ट्रीय स्तर पर कई बार सम्मानित किया गया। इन संस्थाओं में भेल (BHEL) सांस्कृतिक समिति, मानव संसाधन विभाग, भेल (उत्तर प्रदेश), उत्तर प्रदेश व्यापर मंडल (झाँसी), निराला साहित्य संगम समिति (बड़गांव), बुंदेलखंड कला एवं साहित्य संस्थान द्धारा सारस्वत सम्मान (झाँसी), विश्व हिंदी रचनाकार मंच , राष्ट्र गौरव सम्मान, सत्यार्थ साहित्यकार संस्थान द्धारा साहित्य भूषण सम्मान, बुंदेलखंड मुक्ति मोर्चा जैसी कई संस्थाओं का नाम शामिल हैं।

राम मंदिर निर्माण कार्यक्रम के सक्रिय सदस्य, गिरफ़्तारी भी दी थी!

टेलीफोनिक इंटरव्यू के दौरान श्री पाण्डेय जी ने अपने जीवन से जुड़ी एक महत्वपूर्ण घटना का ज़िक्र किया जो हम आपके साथ साझा कर रहे हैं।

उन्होंने बताया, कि सन् 1982 में अयोध्या, सरयू में राम मंदिर निर्माण के दृंढ संकल्प का जो सपथ ग्रहण हुआ था उसमें मैं भी शामिल हुआ था। 1992 में फिर से अयोध्या जाना हुआ वहां हमें गिरफ्तार किया गया फिर बाद में रिहा कर दिया गया। उस वक्त हम राम लला के दर्शन करने बाबरी मस्ज़िद के अंदर गए थे। वहां भगवान श्री राम का पालना डला हुआ था, हमने उसे स्पर्श किया, झुलाया। ये सब चीज़ें मैंने अपनी आंखों से देखीं, आज भी मुझे वहां का एक-एक दृश्य याद है कि हम कहां तक गए थे और हमने क्या-क्या देखा। जब मस्जिद गिरी उसके बाद भी हम वहां गए थे। उस वक्त तो हमें यह एक असंभव सा काम लगता था, लेकिन जब आज ये मंदिर बन कर तैयार हो रहा है तो मैं अपने आप को बड़ा सौभाग्यशाली मानता हूँ कि मैं अपने जीते जी भगवान् का मंदिर देख पाउँगा। जब मैं गिरफ़्तारी देने जा रहा था तब मैंने अपनी पत्नी से कह दिया था कि अगर मैं 10-12 दिन तक घर वापस नहीं आ पाया तो झाँसी से पिता जी के साथ गांव चली जाना। उस समय हम अपनी जान हथेली पर रख कर घर से निकले थे, हालात इतने खराब थे कि अयोध्या में 65000 जवान तैनात थे। शपथ कार्यक्रम में हमारे 16 साथी एक साथ गए थे। फ़ैजाबाद से लेकर अयोध्या तक हमें पैदल जाना पड़ा था, मनीराम की छावनी में चारे में लेट कर हमने रात बिताई थी। हमारी ये तपस्या अब मंदिर निर्माण के साथ सफल होती दिखाई दे रही है।

5 अगस्त के दिन जब अयोध्या में राम मंदिर निर्माण का भूमि पूजन हुआ था, तब उन्होंने श्री राम राजा सरकार पर केंद्रित एक रचना पढ़ी थी जो काफी लोकप्रिय भी हुई। रचना कुछ इस प्रकार है...

प्रभु के नाम से हर काम की शुरुआत करता हूँ,

उन्हीं पर है भरोसा और उन्हीं पर नाज़ करता हूँ।

प्रभु के नाम से कलयुग में सब भव पार तर जाते,

ऐसे प्रभु राम को मैं हर समय में याद करता हूँ।

प्रभु के मंदिर में जाकर सभी आराम पाते हैं,

करो सत्कर्म जीवन में यही गुरुजन सिखाते हैं।

हमारा जन्म तो है बस प्रभु के नाम के ख़ातिर,

यही पंडित, यही मौला, यही गुरु ग्रंथ गाते हैं।

बसा जो बेतवा के तट, ओरछा ग्राम कहते हैं,

बना अति भव्य सा मंदिर प्रभु धाम कहते हैं।

अयोध्या से पैदल चल कर पुख में लाई जो मूरत,

विराजे मंदिर में जो राजा उन्हें श्री राम कहते हैं।

करै दर्शन जो आकर के कामना पूरी हो जाए,

करें स्नान बेतवा में सकल संताप कटि जाएं।

सलामी देते हैं जिनको पुलिस के सरकारी बन्दे,

ऐसे श्रीराम के दर्शन से जीवन धन्य हो जाए।

श्री रामकुमार पाण्डेय जी अप्रैल 1990 में कविता पाठ करते हुए
श्री रामकुमार पाण्डेय जी अप्रैल 1990 में कविता पाठ करते हुए

तो आइए कवि 'झटपट' के साथ हुए टेलीफोनिक इंटरव्यू के कुछ हिस्से झटपट से पढ़ लीजिए...

सवाल- आप कविताएं कब से लिख रहे हैं?

जवाब- मैं कविताएं तो शुरुआत से ही या कह लें जब से होश संभाला है तब से ही लिख रहा हूँ। लेकिन क्या है कि साहित्य से जुड़ना और जुड़ कर के उसका सृजन कर कवि धर्म निभाना, हर किसी के लिए आसान कार्य नहीं होता। पूर्व जन्म के शुभ संस्कारों, कवि जनों के सत्संग एवं मां सरस्वती की असीम कृपा के बिना यह कार्य संपन्न नहीं हो सकता है (कोई कवि नहीं बन सकता). मैं विद्यार्थी जीवन से ही बड़ा जिज्ञासु प्रवत्ति का था, तब से ही मैंने छोटी-छोटी कविताएं लिखना व उन्हें प्रस्तुत करना शुरू कर दिया था। स्वयं की लिखी कविताओं को कंठस्त कर, अपने विद्यालय में जो हर हफ्ते शनिवार के दिन बाल सभा होती थी, वहां अपने शिक्षकों व सभी विद्यार्थियों को सुनाया करता था। खूब तालियां बजती थीं, शिक्षकों से तारीफ़ सुनने को मिलती थी, जिसकी वजह से मेरा भारी उत्साह वर्धन होता गया।

पहले विद्यालयों में अंताक्षरी होती थी। रामायण की चौपाइयों की अंताक्षरी होती थी। यह सुप्रचलन अब विलुप्त सा हो गया है जो हमारी सांस्कृतिक दृष्टि से ठीक नहीं है। उस समय मुझे स्वयं रामचरित मानस की पांच सौ से छः सौ चौपाइयां याद थीं। उन चौपाइयों की वजह से ही मेरे शब्दकोष में धार आई और मैंने स्वयं दोहे व छोटी-छोटी कविताएं लिखना शुरू कर दिया।

सवाल- आपको कविताओं की प्रेरणा व असल समझ कब आई?

जवाब- स्नातक की पढ़ाई कर के मैं शासकीय महाविद्यालय दतिया गया। वहां पर वार्षिक उत्सव हुआ करते थे, उनमें स्थानीय कवि सम्मेलनों व राष्ट्रीय कवि सम्मेलनों का आयोजन होता रहता था। स्थानीय कवि सम्मेलनों में कॉलेज के विद्यार्थी व आस-पास के छोटे-छोटे कवि लोग सम्मिलित हुआ करते थे। मैं भी उन सभी कवि सम्मेलनों का हिस्सा हुआ करता था लेकिन, एक दर्शक के रूप में। उस वक्त, मेरे अंदर दृढ़ इच्छा जागती थी कि मैं भी इन सभी कवियों की तरह मंच पर जाऊं और अपनी रचनाएं सुनाऊं।

फिर मैंने 'राष्ट्रीय सेवा योजना शिविर' में भाग लिया, ग्रेजुएशन के वक्त मैं राष्ट्रीय सेवा योजना का एक सक्रिय सदस्य भी था। 15 दिन का कैंप लगा था जिसमें हम शामिल हुए थे। उस शिविर में शाम के वक्त सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन हुआ करता था। वहां पर सभी साथी कहा करते थे कि पाण्डेय जी आप भी कुछ सुनाइए। तो फिर क्या, उस वक्त मैं तो ताक में ही रहता था कि कोई कहे और मैं अपनी रचनाएं सुनाऊं...... आज भी रहता हूँ।

उन दिनों मैं सिर्फ हास्य रस में कविताएं लिखता था। इसके पीछे का मेरा मुख्य उद्देश्य यही था कि मैं लोगों को हंसाऊं। उस समय मेरे साथ रह रहे विद्यार्थी ऐसे रहते थे जैसे कि पूरे संसार का बोझ इन्हीं के ऊपर हो, पढाई और पारिवारिक चिंता से ग्रस्त रहते थे। इसीलिए मेरा मकसद रहता था कि मेरे व्यंगों, हास्य रचनाओं और चुटकुलों से उनका कुछ मन बेहले और वो थोड़ा हंस लें। मेरा सोचना यही रहता था कि मेरी लिखी रचनाओं से कोई थोड़ा सा भी हंस ले तो मेरा लिखना सार्थक हो जाए।

मैंने छोटी-छोटी ऐसी कई कविताएं, चुटकुले, हास्य व्यंग रचनाएं लिखीं जो लोगों को खूब पसंद आए। फिर मैंने धीरे-धीरे नवांकुर की गोष्ठियों में हिस्सा लेना शुरू किया जो महीने में एक बार होती थीं और नए-नए युवाओं को कविताएं करने का मौका दिया करती थीं।

सवाल- कविताएं रचने के अलावा आपका और क्या पेशा है?

जवाब- भेल (Bharat Heavy Electricals Limited) में इंजीनियर (अपर अभियंता) था मैं, साल 2019 में सेवा निवृत्त हुआ हूँ। अपनी पढाई पूरी करने के बाद साल 1984 में मुझे भेल में अपनी सेवाएं देने का अवसर प्राप्त हुआ और इस कंपनी में नौकरी शुरू करने के बाद मेरे कवि जीवन ने भी नई उड़ान भरी। नौकरी करने झाँसी आया तो मुझे पता चला कि यहां 'नवोदित साहित्यकार परिषद्' नाम की एक गोष्ठी चलती है। वो कहते हैं ना, जिसे जिस चीज़ की चाह होती है वो उसे खुद व खुद मिल जाती है या फिर वो व्यक्ति उसे ढूंढ ही लेता है। तो मैं नवोदित साहित्यकार परिषद् से जुड़ा और मेरा सौभाग्य था कि जहां मैंने नौकरी जॉइन की वहां पहले से ही मेरे से 3 वरिष्ठ कवि पदस्थ थे। मैं उनके संपर्क में आया और और फिर लगातार गोष्ठियों में हिस्सा लेना शुरू कर दिया। मुझे विषय बता दिया जाता था, जैसे कि अभी चुनाव का परिदृश्य चल रहा है तो चुनाव पर कविताएं करनी है। फिर उन गोष्ठियों में जिसकी रचनाएं सर्वश्रेष्ठ होती थीं उन्हें सम्मान मिलता था। एक कवि को चाहिए क्या? सिर्फ तालियां! फिर लगातार इस तरह की गोष्ठियां चलती रहीं।

मौजूदा वक्त में मैं उसी 'नवोदित साहित्यकार परिषद्' का उपाध्यक्ष हूँ एवं अखिल भारतीय साहित्यकार परिषद् के अध्यक्ष की भूमिका निभा रहा हूँ। कोरोना काल की वजह से फ़िलहाल गोष्ठियां बंद हैं, नहीं तो हमारी मासिक गोष्ठियां लगातार चलती रहती हैं और उन गोष्ठियों में कविता प्रेमी लोग बढ़चढ़ कर हिस्सा लेते हैं।

सवाल- BHEL में नौकरी करते हुए आपने अपने जुनून को बरक़रार कैसे रखा?

जवाब- इसमें मुझे कुछ ख़ास दिक्कत नहीं आई क्योंकि जितनी भी गोष्ठियां होती थीं वो शाम के वक्त या फिर साप्ताहांत में हुआ करती थी जो मेरे कार्य-समय में कभी आड़े नहीं आईं। हालांकि इतनी व्यस्तता के बाद समय निकाल कर रचनाएं लिखना थोड़ा चुनौती पूर्ण कार्य होता था। हमारी तो स्वयं भेल (BHEL) कंपनी की ही एक पत्रिका निकला करती थी 'सृजन', जिसमें हम अपनी रचनाएं भेजा करते थे।

BHEL में आने के बाद मुझे और अच्छा मंच मिला, मैंने क्षेत्रीय कवि सम्मेलनों के साथ-साथ कई अखिल भारतीय स्तर के कवि सम्मेलनों में भी हिस्सा लिया। मैंने कई राष्ट्रीय स्तर के कवि सम्मेलनों में वरिष्ठ कवियों के साथ हिस्सा लिया है और आज भी मुझे कई बड़े मंचों के लिए निमंत्रण आते हैं और मैं उनमें हिस्सा लेता हूँ।

सवाल- बुंदेली भाषा में कविताएं लिखते हैं?

जवाब- शुद्ध बुंदेली तो नहीं, लेकिन मेरी कविताओं में बुंदेली भाषा के बहुत से शब्द होते हैं। मैं बुंदेलखंडी ही हूँ, लेकिन बदलते समय के साथ बुंदेली भाषा विलुप्ति की कगार पर आ खड़ी हुई है। शहरों की तो बात ही क्या करनी आजकल गावों में तक शुद्ध बुंदेली नहीं बोली जाती। हमें इसे बचाना होगा।

सवाल- ऐसे कौन से कवि हैं जिन्हें आप अपना आदर्श मानते हैं?

जवाब- कवि श्रेष्ठ काका हाथरसी ही हमेशा से मेरे आदर्श रहे हैं। जैसी कविताएं वो लिखते थे, 6-6 लाइन की कुंडलियां, ठीक उसी तर्ज पर मैं भी लिखा करता था। उनका दो बार झाँसी आना हुआ, मैं उन्हीं से सबसे अधिक प्रेरित हुआ। उनकी एक खासियत थी, वो किसी व्यक्ति विशेष को कभी टारगेट नहीं करते थे चाहे उन्हें राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में अपनी बात कहनी हो या फिर सामाजिक। उन्हें जो भी लिखना या मंच पर सुनाना होता था खुद को या अपनी पत्नी (काकी) को टारगेट करके बड़ी से बड़ी, गहरी बात कह जाते थे।

सवाल- आपके द्धारा रचित एक पुस्तक 'पुष्पांजलि' भी प्रकाशित हो चुकी है, उसमें लिखी कविताओं, गीतों, व्यंगों में आपके दिल के सबसे करीब कौन सी रचना है?

जवाब- मैंने ये कभी भी नहीं सोचा था कि मुझे अपने व्यंगों कविताओं पर आधारिक कोई पुस्तक लिखनी है। अगर मैं यह सोच कर रखता तो अब तक मैं बहुत सी पुस्तकें लिख चुका होता। ये जो मेरी पुस्तक 'पुष्पांजलि' प्रकाशित हुई है इसका श्रेय मेरे बेटों को जाता है उन्होंने मुझे इसके लिए प्रेरित किया। जहां से जितनी रचनाएं लिखीं, मेरी पुस्तक 'पुष्पांजलि' पुस्तक में मौजूद हैं। इन सभी रचनाओं में मेरे दिल के बेहद करीब जो रचना है वो मैं आपको सुना देता हूँ...

इस कविता का टाइटल है 'फूलों में फूल, गोभी का फूल' और इस कविता के पीछे बहुत सारी कहानियां भी जुडी हैं। जब भी मैं मंच पर होता था मुझसे इस कविता को सुनाने की मांग ज़रूर होती थी। मज़े की बात तो ये है, जब मेरे रिटायरमेंट पर बिदाई समारोह का आयोजन हुआ था तब इस कविता के चलते ही मेरे चाहने वालों ने मेरे लिए जो फूलों की माला बनवाई थी उस माला के झूमर में गोभी का फूल लटका दिया था। कवि सम्मेलनों में जब भी बड़े नेता/मंत्री पधारते थे तो इसी गोभी के फूल की कविता से उनका स्वागत कराया जाता था, रचना कुछ इस प्रकार है-

RamKumar Pandey during Pushpanjali Launch
RamKumar Pandey during Pushpanjali Launch

फूलों में सबसे बड़ा है, गोभी का फूल,

माला में गूंथें नहीं, है कितनी ये भूल।

है कितनी ये भूल, फूल का रूप भी उसने पाया,

पर बेचारा रहा सोचता, नहीं मंच पर आया।

है कितना दुर्भाग्य, फूल की उपमा फिर क्यों पाई,

ना मंदिर में कोई चढ़ाता ना स्वागत में ले जाई।

इतना होते हुए फूल, फिर भी ना पीछे रहता,

शाम-सवेरे ताज़ा-ताज़ा, हाट गली में आता।

फूलों की खुशबू लेकर, हम फेंक सड़क पर जाते,

पर गोभी की सब्जी बनाकर, बड़े चाव से खाते।

कितने गुण गोभी के अंदर, सब कुछ तुमने जाना,

फूलों की जहां लगे प्रदर्शनी, वहां इसको भी रखवाना।

मंत्री जी यदि कहीं पधारें, माला फूलों की बनवाना,

पर मेरे कहने से यारों, झूमर गोभी की लटकाना।

स्वागत करते वक्त मंच पर, गले बीच पहनना,

हाथ मिलाकर बड़े प्रेम से, ताली खूब बजाना।

खास तौर पर, मेरी इस कविता को राष्ट्रीय व क्षेत्रीय स्तर पर बहुत सम्मान प्राप्त हुए हैं। उस दौर में इस कविता को काफी ज्यादा मीडिया कवरेज भी मिला करता था तब मैं उस पेपर की कटिंग अपने पास रख लिया करता था। मेरे पास आज भी 1980, 82, 84 के समाचार पत्रों की कटिंग राखी हुई हैं जिनमें मेरा नाम छपा था। उस दौर में सोशल मीडिया जैसी कोई चीज़ नहीं थी।

सवाल- जी, यही मेरा अगला सवाल था कि आज के दौर में जितने भी प्रसिद्द कवि हैं, उनकी सफलता के पीछे का एक बड़ा कारण सोशल मीडिया भी है। तो आपके मन में कभी ये बात नहीं आई कि आपको भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स का सहारा लेना चाहिए?

जवाब- अभी मेरी उम्र 62 वर्ष है और मैं आपको सच्चाई बताऊं तो मैं जिस गांव में पला बढ़ा हूं, वह 5000 हज़ार की आबादी वाला एक बेहद पिछड़ा गांव था। उस गांव में मैं तीसरा व्यक्ति था जिसने नौकरी की, बाकी अधिकतर लोग अशिक्षित थे और कृषि पर ही निर्भर थे। मैं जन्म और कर्म दौनों से ब्राह्मण हूँ। मेरे परिवार में कोई भी नौकरी तक करने के पक्ष में नहीं था। हम लोग पंडिताई(पूजा पाठ, यज्ञ, हवन, कर्मकांड) करते थे। जब मैं पढाई करके नौकरी करने BHEL आया तो मेरी माता जी कहा करती थीं कि हमें क्या नौकरी करना, घर आ जाओ, यहीं अपना कर्म करो, हमें इसकी ज़रुरत नहीं है। तो मैं आपको ये बताना चाहता हूँ, कि मोबाइल से हमारा रिश्ता बहुत देर से जुड़ा और उस दौर में स्मार्टफोन का तो नामोनिशान तक नहीं था। इसलिए मैं सोशल मीडिया के साथ फैमिलियर नहीं हो पाया। हालांकि, हाल ही मैंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर लाइव आना शुरू किया है, मेरे से जुड़े लोगों की उसमें अच्छी दिलचस्पी भी दिखाई देती है।

मैं इस बात से पूरी तरह सहमत हूँ कि डिजिटली एक्टिव होने से पहचान बहुत जल्दी मिलती है, बहुत से युवा कवि जो हमारे साथ मंच साझा करते हैं। वे हमारे साथ अपनी तस्वीरें खींचकर सोशल मीडिया पर डालते हैं, वीडियोस अपलोड करते हैं। वो युवा वर्ग हमसे भी आगे जा रहा हैं और हमें तो आज भी इस बात की सुध ही नहीं रहती कि अपनी फोटो खिंचा लें। सच कहें, तो हमें सोशल मीडिया की उतनी समझ नहीं है, हम बस समय के साथ थोड़ा बहुत सीख रहे हैं।

सवाल- झटपट नाम कैसे पड़ा?

जवाब- पहले क्या होता था कि कवि सम्मेलनों, गोष्ठियों से पहले एक विषय दे दिया जाता था कि आज आपको इस परिप्रेक्ष्य में व्यंग करना है। मैं विषय मिलते ही 4 -6 लाइन तुरंत (बुंदेली भाषा में कहें, तो झटपट से) लिख देता था, इसलिए मेरे साथी कवियों जिनमें से एक भोपाल शहर के रविशंकर प्यासी जी थे, ख़ास तौर पर उन्होंने मुझे ये नाम दिया। वो कहा करते थे कि आप झटपट रचनाएं लिख देते हैं, आपका नाम झटपट होना चाहिए। हम सभी कवियों के कुछ न कुछ उपनाम हुआ करते हैं और हम सभी एक दुसरे को उन्हीं उपनामों से बुलाया करते हैं जो हम ही मिलजुल कर दिया करते थे। कवि, साहित्यकार मानवता वादी होते हैं इसलिए इन्हें उपनाम की आवश्यकता पड़ती है ताकि उन्हें किसी जाति, धर्म से ना जोड़ा जाए और ये उसी नाम से ख्याति प्राप्त करें।

सवाल- राजनीति से कवियों की अच्छी तुकबंदी होती है, आपका क्या मानना है?

जवाब- इस बात को बिलकुल भी नकारा नहीं जा सकता कि कुछ कवि अपनी कलम बेच देते हैं। राजनीतिक चाटुकारिता या योजनात्मक विरोध करते हैं। लेकिन मैंने कभी राजनैतिक चाटुकारिता नहीं की जो दिल में आया वही लिखा, जो सत्य लगा वही लिखा।

आखिरी सवाल- इस वैश्विक महामारी 'कोरोना' पर आपने कुछ लिखा है?

जवाब- जब कोरोना हमारे देश में घुसा था और पहला लॉकडाउन लगा था तब मैंने एक रचना लिखी थी, हालांकि कोरोना के चलते मैं ये रचना किसी कवि सम्मलेन में नहीं सुना पाया हूँ। आज आपको सुना रहा हूँ...

'मुक्तक'

कोरोना रोग न छोटा, भयंकर ये बिमारी है,

सिर्फ न भारत में फैला, परेशां दुनिया ये सारी है।

दवा कुछ है नहीं इसकी, सुरक्षा को अपनाना है,

हाथ साबुन से धोना है, मास्क मुंह पर लगाना है।।

'गीत'

कोरोना का रोना रो रहे, दुनिया में सब भाई,

अभी तलक ना आई है भैया, जाकी कोई दवाई।

जानें कैसी जौ बीमारी, लक्षण तक ना जानें,

कोई कहै बुखार आता है, तब जाकों पहिचानों।।

कोई कहे खांसी जुकाम, जाकी पहिचान बताई...

अभी तलक ना आई है भैया, जाकी कोई दवाई...

जिधर भी देखो डरे हुए सब, भीड़ में न कोई जावें,

काम काज सब मन्दे पड़ गए, कैसे इन्हें बढ़ावें।

सूचकांक इतने नीचे हुआ, चिन्हित है सब भाई,

अभी तलक ना आई है भैया, जाकी कोई दवाई।।

प्रशासन पूरा चौकन्ना, सारी करें तैयारी,

जगह-जगह पर केंद्र बना दए, करीं सूचना जारी।

प्रिकॉशन सबको समझा रहे, मास्क पहन लो भाई,

अभी तलक ना आई है भैया, जाकी कोई दवाई।।

लॉकडाउन शासन ने कर दिया, बाहर कोई न जावै,

जो भी मिलने आवै तुमसे, दूरी सदा बनावै।

हाथ मिलाना छोडो यारों, करो नमस्ते भाई,

अभी तलक ना आई है भैया, जाकी कोई दवाई।।

कहें 'झटपट' कवि राय, नहीं कोरोना से है डरना,

करो सामना सब मिल कर के, न ही पीछे हटना।

निश्चित जीत हमारी होगी, हिम्मत रखना भाई

अभी तलक ना आई है भैया, जाकी कोई दवाई।।

Pratinidhi Manthan
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