प्राइवेट अस्पतालों में वैक्सीनेशन के लिए क्यों राजी हुई सरकार?

प्राइवेट अस्पतालों में वैक्सीनेशन के लिए क्यों राजी हुई सरकार?

Ashish Urmaliya || Pratinidhi Manthan

हमारे देश में 45 से 55 वर्ष की उम्र के लोगों की आबादी कुछ कम नहीं है, इस लिहाज से देखा जाए तो अगर वैक्सीनेशन की प्रक्रिया सिर्फ सरकारी अस्पतालों में होती है, तो एक बड़ी आबादी तक वैक्सीन पहुंचने में बहुत समय लग सकता है। लोगों को लंबे समय तक इंतज़ार करना पड़ सकता है। दूसरा कारण यह भी है कि कोरोना ने फिर से भारत के दरवाजे खटखटाने शुरू कर दिए हैं इसलिए सरकार चाहती है कि वैक्सीनेशन की प्रक्रिया जितनी जल्दी पूरी हो जाए उतना अच्छा, नहीं तो बना बनाया काम गड़बड़ा जाएगा।

केंद्रीय कैबिनेट ने कोरोना वायरस टीकाकरण कार्यक्रम के संबंध में एक बड़ा ऐलान कर दिया है। केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने जानकारी दी, कि 1 मार्च से प्राइवेट अस्पतालों में भी कोरोना वायरस का टीका लग्न शुरू हो जाएगा। वो बात अलग है कि अगर कोई प्राइवेट अस्पताल से टीका लगवाता है तो उसको उसका आर्थिक भुगतान स्वयं से करना पड़ेगा। प्राइवेट अस्पताल में कोरोना का टीका फ्री नहीं होगा। अगले कुछ ही दिनों के भीतर केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय प्राइवेट अस्पतालों में वैक्सीन लगवाने पर कितना भुगतान करना होगा, इस बारे में वैक्सीन निर्माताओं और अस्पतालों से चर्चा करेगा और फिर हमें इसकी जानकारी देगा या फिर कह लें कि उचित रेट तय करके बताएगा ताकि किसी तरह का कोई झोल ना हो सके। हमारे हिसाब से सरकार इस पर विचार ज़रूर करेगी और करना भी चाहिए। विदित हो कि 16 जनवरी से शुरू हुए कोरोना वायरस टीकाकरण अभियान में सरकार ने अब निजी क्षेत्र को भी अपने साथ ले लिया है। इस फैसले के बाद सबके मन में यही सवाल उठ रहा है कि आखिर सरकार प्राइवेट अस्पतालों में टीकाकरण (Vaccination in private hospitals) के लिए राजी क्यों हुई?

महाराष्ट्र में कोरोना के दो नए स्ट्रेन पाए गए हैं!

मुद्दे की बात ये है कि वैक्सीनेशन के इस कार्यक्रम में निजी क्षेत्र के आने से टीकाकरण प्रक्रिया को रफ्तार मिलेगी। केरल, महाराष्ट्र समेत देश के कई राज्यों में कोरोना वायरस के नए मामले एक बार फिर से बढ़ना शुरू हो गए हैं। इसके साथ ही यवतमाल और अमरावती में कोरोना वायरस के दो नए स्ट्रेन भी मिले हैं जो सबसे बड़ी चिंता का विषय हैं। महाराष्ट्र का ग्रामीण पृष्ठभूमि वाला विदर्भ क्षेत्र वायरस संक्रमण का नया केंद्र बनता दिखाई दे रहा है। महाराष्ट्र सरकार ने राज्य के कई हिस्सों में लॉकडाउन की घोषणा भी कर दी है। केरल राज्य में लगातार सबसे ज्यादा मामले सामने आ रहे हैं। राजस्थान के जोधपुर में भी रात वाला कर्फ्यू लगा दिया गया है। मध्य प्रदेश सरकार भी एक्टिव मोड में दिख रही है, अन्य राज्यों से आने वाले लोगों की थर्मल स्कैनिंग हो रही है। कर्नाटक और केरल के बॉर्डर पर स्थित इलाकों में अतिरिक्त सतर्कता बरती जा रही है। केरल से कर्नाटक जाने वाले लोगों के लिए कोरोना नेगेटिव रिपोर्ट अनिवार्य कर दी गई है। यही नियम दिल्ली सरकार द्वारा भी लागू कर दिया गया है. कई अन्य राज्यों ने भी अपने स्तर पर कई उपयुक्त कदम उठा लिए हैं।

1 मार्च से दूसरे चरण की शुरुआत होगी, पहला चरण समाप्ति की ओर है...

मौजूदा वक्त में देश भर में कोरोना के नए आंकड़े बता रहे हैं कि देश में वायरस संक्रमण फिर से कहर बरपाने के मूड में है। ऐसी स्थिति में टीकाकरण कार्यक्रम को ज्यादा तेजी के साथ आगे बढ़ाना जरूरी हो चुका है। जनवरी के महीने से टीकाकरण कार्यक्रम की शुरुआत हुई थी। सरकार ने स्वास्थ्य कर्मियों और फ्रंटलाइन वर्कर्स को प्राथमिकता देते हुए पहले टीकाकरण करना शुरू किया और फरवरी के आखिरी हफ्ते तक 1 करोड़ से ज्यादा स्वास्थ्यकर्मियों और फ्रंटलाइन कर्मचारियों को कोरोना का टीका लग चुका है। स्वास्थ्यकर्मियों और फ्रंटलाइन कर्मचारियों के बाद अब जो सबसे जरूरी लोग हैं वह हैं 60 से ज्यादा उम्र के लोग। 60 साल व उससे अधिक उम्र वाले लोगों को टीका लगाने के लिए सरकार ने 1 मार्च से कार्यक्रम शुरू करने का ऐलान किया है।

देश की बड़ी आबादी को करना पड़ रहा है इंतज़ार-

60 वर्ष व उससे अधिक उम्र वाले लोगों के साथ ही गंभीर बीमारियों वाले 45 वर्ष से ज्यादा उम्र के लोग वैक्सीन लगवा सकेंगे। अगर 45 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों की आबादी को देखा जाए तो सिर्फ सरकारी अस्पतालों के भरोषे टीकाकरण कराने से बड़ी आबादी को कवर करने में ज्यादा समय लगने की संभावना है। ज्यादातर लोगों को लंबे समय तक इंतजार करना पड़ सकता था। यही वजह है कि निजी क्षेत्र की भागीदारी की अहमियत बढ़ गई है। हम यह कह सकते हैं कि केंद्र सरकार ने एक तरीके से उचित समय पर निजी क्षेत्र को टीकाकरण कार्यक्रम में शामिल कर लिया है। हालांकि यह कदम सरकार को पहले ही उठा लेना चाहिए था। इस निर्णय से सरकार के टीकाकरण कार्यक्रम के खर्च में भी कटौती होगी।

अर्थव्यवस्था के मामले में कोई कोम्प्रोमाईज़ नहीं करना चाहती सरकार-

कोरोना वायरस मेंभारत देश की अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ दी है। धीरे-धीरे देश वापस पटरी पर आने की कवायत में जुटा हुआ है। टीकाकरण कार्यक्रम में निजी क्षेत्र की एंट्री से अर्थव्यवस्था जैसी महत्वपूर्ण चीज पर फोकस करते हुए सरकार कोरोना के असर को थाम पाएगी। भगवान न करे अगर वायरस संक्रमण को लेकर भविष्य में स्थिति बिगड़ती है, तो अर्थव्यवस्था पर उसका असर दोबारा पड़ेगा। पुनः औद्योगिक इलाकों में लॉकडाउन और कामकाज की बंदी आम जिंदगी को बदहाल बना देगी। ऐसे में अगर सरकार ने स्थिति की संभालते हुए अर्थव्यवस्था को नहीं संभाला तो देश के साथ साथ सरकार भी बैकफुट पर नजर आएगी। 2020 की तरह लॉकडाउन में वापस जाना बिलकुल भी सही नहीं होगा। टीकाकरण में निजीकरण के केंद्र सरकार के फैसले से यही बात जाहिर होती है कि सरकार अब अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर पीछे नहीं लौटना चाहती है।

Pratinidhi Manthan
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