क्या बला है ये पराली? जो हर साल दिल्ली की हवा को जहर बना देती है

क्या बला है ये पराली? जो हर साल दिल्ली की हवा को जहर बना देती है

Ashish Urmaliya ||Pratinidhi Manthan

दिल्लीराज्य चारों ओर से घिरा हुआ है। एक तरफ हरियाणा है, तो दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश। इसकेअलावा दिल्ली का हल्का-हल्का कनेक्शन पंजाब और राजस्थान से भी है। कहने का मतलब, किये राज्य भी ज्यादा दूर नहीं है लगभग सटे हुए से ही हैं। अब आप ही बताइये, जब दिल्लीके चारों तरफ खेतों में पराली जलाई जाएगी तो उसका धुआं मध्य में आकर तो जमेगा ही।   

हरसाल दिवाली के आस-पास दिल्ली की हवा जहरीली हो जाती है और इसकी मुख्य वजह पराली हैक्योंकि सभी राज्यों के किसान धान की खेती के बाद निकलने वाली पराली को जला कर नष्टकरते हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक, देशभर में 31 करोड़ टन से ज्यादा फसल अवशेष जलायाजा रहा है और इसकी वजह से एयर क्वालिटी इंडेक्स लगातार खतरनाक स्थिति की तरफ बढ़ रहाहै। पूरे भारत की स्थिति खराब है, हर एक व्यक्ति ज़हरीली सांस ले रहा है और सबसे बदतरस्थिति उत्तर भारत की है।

पराली जलाने में पंजाब सबसे आगे!

जबअदालत में यह मामला चला, तो वहां सैटेलाइट के चित्र पेश किये गए जिसमें साफ़ साफ़ दिखाईदिया कि तरणतारण, पटियाला, संगरूर सहित चार जिलों में पराली जलाने की घटनाएं सबसे अधिकहैं। कुल जलने वाली पराली में से 46 फीसदी पराली इन 4 जिलों में ही जलाई जाती है।

उच्चतम न्यायलय ने किसानों कोफटकारा-

दिल्लीके गैस चैम्बर बनने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने किसानों को आड़े हांथों लेते हुए कहा, किकिसान अपनी आजीविका की दलील देकर दूसरों को मौत के मुंह में नहीं ढकेल सकते। अगर किसानपराली जलाना जारी रखेंगे तो उनके प्रति हमारी कोई सहानभूति नहीं रहेगी। अदालत ने यहभी कहा, कि पराली की वजह से दिल्ली वालों की उम्र कम हो रही है। बता दें, पराली वालेमुद्दे पर जस्टिस अरूण मिश्रा और जस्टिस दीपक गुप्ता की पीठ सुनवाई कर रही थी। न्यायाधीशोंने कहा, कि कोई भी किसान यह दावा नहीं कर सकता कि पराली जलाना उसका अधिकार है। परालीजलाने के पीछे किसान कोई भी दूसरी दलील नहीं दे सकता क्योंकि, जो लोग पराली जलाना नहींरोकते, दूसरे लोगों और प्रदूषण के बारे में नहीं सोचते तो वे अन्य अधिकारों का दावाभी नहीं कर सकते।

किसानों की समस्या और दलीलेंक्या हैं?

जानकारकिसानों के मुताबिक, दिवाली के आस-पास हवा का बहाव कम हो जाता है और हवा में आद्रता(Humidity)भी बढ़ जाती है। इससे जलने के बाद पराली के कण बहकर दूर नहीं जाते स्थिर हो जाते हैंऔर प्रदूषण का कारण बनते हैं। कुछ साल पहले प्रदुषण इसलिए नहीं होता था क्योंकि परालीको सितंबर के अंत से लेकर अक्टूबर के मध्य तक जलाया जाता था, इस दौरान हवा का बहावअच्छा होता है इसलिए पराली प्रदुषण का कारण नहीं बनती।

लेकिन सवाल ये खड़ा होता है, किअब किसान पराली को अक्टूबर नवंबर में क्यों जलाने लगे हैं और सितंबर-अक्टूबर में क्योंनहीं?

इसका सीधा सा जवाब, जब धान कटेगीउसके बाद ही किसान पराली को जलाएंगे। तो अब सवाल यह है, कि धान की कटाई में इतना विलंबक्यों होने लगा है?

तो आइये इसका विश्लेषण करते हैं।

पहलेकिसान पारंपरिक रूप से जून के पहले हफ्ते से धान की बुआई शुरू कर देते थे। बुआई केठीक 120 दिन बाद फसल लगभग तैयार हो जाती थी। सितंबर से मध्य अक्टूबर के बीच किसान अलग-अलगसमय पर फसल के पकने के चलते पराली भी अलग-अलग समय पर जलाया करते थे। मतलब, 5-10 दिनके अंतराल से, इसलिए धुआं भी हवा के बहाव से आसानी से दूर हो जाता था। लेकिन अब 'पानी'की कमी की वजह से किसानों को एक ही समय पर एक साथ धान की बुआई करनी पड़ती है तो परालीभी एक साथ ही निकलती है और उसको जलाते भी एक ही साथ हैं तो यह प्रदुषण की समस्या होनालाज़मी है ही।

तोकिसानों के अनुसार पानी की कमी की वजह से बुआई का समय सिकुड़ चुका है और इस समस्या केनिदान के लिए सरकार को कुछ करना चाहिए।

सरकार की मिस्टेक-

उदाहरणके तौर पर पंजाब को उठा लीजिये, गर्मी के सीजन में वैसे भी पानी की किल्लत होने लगतीहै और ये किल्लत बढ़ने न पाए इसलिए सरकार ने किसानों पर 20 जून से पहले धान की बुआईपर कुछ वर्षों पहले प्रतिबंध लगा दिया है। (कई अन्य राज्यों ने भी इसी तरह का प्रतिबंधलगा रखा है)। इस वजह से किसानों को मजबूरन 20 जून के बाद फसल की बुआई करनी पड़ती हैऔर देरी के चलते सभी एक साथ बुआई करते हैं तो कुल मिलाकर इस विलंब के कारण यह परालीअक्टूबर के अंत में एक साथ उत्पन्न होती है और एक ही साथ जलाई जाती है।

सरकार की एक गलती यह भी-

आजके समय में धान की फसल मजदूरों की बजाय मशीनों से कटवाई जा रही है। मजदूरों की कटाईकी अपेक्षा मशीनों की कटाई से ज्यादा पराली निकलती है। इसकी वजह से नुकसान यह है, किमजदूरों के रोजगार में कमी आती है और किसानों को फायदा यह है, कि मशीन से कटाई मेंकिसानों की लागत कम हो जाती है। अब किसानों का कहना है, कि अगर सरकार दो-तीन सौ रूपएप्रति क्विंटल धान का समर्थन मूल्य बढ़ा दे, तो वे मजदूरों से कटाई करवाने लगेंगे औरयह समस्या काफी हद तक काम हो जायेगी। लेकिन सरकार सिंचाई की व्यवस्थाओं को बढ़ावा देनेकी वजाय कटाई वाली मशीनों पर सब्सिडी बढ़ा रही है।  

समाधान-

फसलकटाई के समय और पश्चात अवशेषों को जलाने से हवा में विषैले तत्वों की मात्रा 33 से270 गुना बढ़ जाती है। परिवर्तन का प्रभाव वातावरण में लंबे  समय तक रहता है, जो मनुष्य एवं पशुओं की त्वचा परजमा हो जाता है। इससे घातक बीमारियां होती हैं। लेकिन आपको एक बात बता दूं, फसल कटाईके पश्चात इसका जो एक बड़ा हिस्सा अवशेष के रूप में बचता है वह भी कहीं न कहीं उपयोगीहै। दरअसल, यह नवीकरणीय ऊर्जा का स्रोत होता है। तो इसका किस तरीके से उपयोग किया जासकता है आइये जानते हैं-

–फसल अवशेषों को खेत में पुन: जोत कर मृदा स्वास्थ्य को बढ़ाया जा सकता है। हालांकिकृषि विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डॉ. आरएस सेंगर के मुताबिक, धान का भूसा मृदा में मिलानेपर मीथेन गैस उत्सर्जन होता है जो ग्लोबल वार्मिंग को बढ़ा सकता है, लेकिन यह दूरगामीबात है।  

–अवशेषों को ईंधन, कंपोस्ट, पशु आहार, घर की छत और मशरूम उत्पादन आदि कार्यों में उपयोगकिया जा सकता है।

–इससे जैविक ईंधन भी तैयार किया जा सकता है।

इसकेसाथ ही सरकार कुछ नियमों में बदलाव करके, किसानों की पानी की समस्या का समाधान करकेपरली से होने वाले प्रदूषण की समस्या में सुधार ला सकती है।

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