न कोई मंत्री बने, ना ही मुख्यमंत्री, सीधे प्रधानमंत्री। देश के नौवें प्रधानमंत्री श्री चंद्र शेखर

बगावती तेवर वाले चंद्र शेखर के कांग्रेस के शीर्ष नेताओं के साथ लंबे समय तक मतभेद चले। वे हमेशा ही व्यक्तिगत राजनीति के खिलाफ रहे, उनकी राजनीति हमेशा सामाजिक व वैचारिक परिवर्तनों पर ही केंद्रित रही। 1971 में उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के विरोध के बावजूद कांग्रेस की राष्ट्रीय कार्यसमिति का चुनाव लड़ा और जीते भी।
न कोई मंत्री बने, ना ही मुख्यमंत्री, सीधे प्रधानमंत्री। देश के नौवें प्रधानमंत्री श्री चंद्र शेखर
Shree Chandra Shekhar Ji

आपने 'युवा तुर्क' शब्द सुना होगा। आजकल कई छुटभैये, बड़भैये नेताओं के लिए ये शब्द लिखकर उनके कार्यकर्ता लोग जन्मदिन विशेष फेसबुक, इंस्टाग्राम पोस्ट डालते दिखाई दे जाते होंगे। लेकिन असल में भारत में इस शब्द को पहचान कब मिली थी जानते हैं आप? गूगल कर लीजिएगा मेरसे ज्यादा मेहनत ना होती।

'युवा तुर्क' जैसा कि आपने पढ़ा, नाम में ही तुर्क शब्द शामिल है। मतलब, सीधी सी बात है इस शब्द का सीधा संबंध तुर्की से है। हुआ क्या, कि तुर्की में 1842 से 1918 तक 'सुल्तान अब्दुल हमीद द्वितीय' का शासन चलता था। उसके शासन से वहां के लोग परेशान हो चुके थे। उसी दौरान तुर्की के कुछ युवा लोग सुल्तान के खिलाफ बगावत कर देते हैं, नतीजतन वहां संवैधानिक सरकार बन जाती है। सुल्तान के खिलाफ जिन लोगों ने बगावत की थी वे सुधारवादी व प्रगतिशील विचारधारा वाले लोग थे। सत्ता में आते ही उन्होंने तुर्की देश के आधुनिकीकरण पर जोर देना शुरू कर दिया। बस यहीं से 'युवा तुर्क' शब्द का जन्म हुआ और इसको परिभाषा भी मिली।

दरअसल, तुर्की के जो युवा थे वे क्रांतिकारी और बागी थे। उनकी विचारधारा उदार और सेक्युलर थी। इसी के चलते दुनियाभर में जितने भी क्रांतिकारी और बागी सोच वाले युवा होते, उन्हें लोग युवा तुर्क कहकर संबोधित करने लगे और इस शब्द का प्रचार प्रसार लगातार बढ़ता चला गया।

तो कुल मिलाकर ऐसा व्यक्ति या ऐसे लोगों का समूह जिनकी सोच कुछ नया करने की हो, जिनके पास समाज में बदलाव करने का नया आईडिया हो, जो क्रांतिकारी प्रवत्ति व प्रगतिशील विचारधारा के हों उन्हें युवा तुर्क कहा जाता है। किसी पार्टी, विचार या समाज से बगावत करने वाले युवाओं को भी 'युवा तुर्क' कहा जाता है। ज्योतिरादित्य सिंधिया जब कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आए, मध्यप्रदेश की कांग्रेस वाली सरकार को गिरवा दिया तब सिंधिया जी के लिए भी समर्थकों द्वारा 'युवा तुर्क' शब्द का इस्तेमाल किया गया था।

माफ़ कीजिएगा, मैं लिखते-लिखते हमेशा ही अपने मूल विषय से भटक जाता हूं। किडिंग. . . ! तो आज हम बात करने वाले हैं देश के नौवें प्रधानमंत्री श्री चंद्र शेखर के बारे में जो हमारे देश के पहले युवा तुर्क माने जाते हैं।

गर्म स्वभाव की शख्सियत श्री चंद्र शेखर जी का जन्म उत्तर प्रदेश के प्रसिद्ध 'बलिया' जिले के इब्राहिमपट्टी गांव के एक किसान परिवार में 1 जुलाई 1927 को हुआ था। शुरूआती शिक्षा भीमपुरा के रामकरण इंटर कॉलेज से प्राप्त की। फिर इलाहाबाद विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में MA की डिग्री प्राप्त की। विद्यार्थी जीवन से ही भयंकर राजनीति की, इतनी कि उस वक्त उन्हें 'फायरब्रांड' के नाम से जाना जाने लगा था। पढ़ाई-लिखाई पूरी करके वे समाजवादी राजनीति में सक्रिय हो गए। श्री चन्द्र शेखर का विवाह श्रीमती दूजा देवी से हुआ एवं उनके दो पुत्र पंकज और नीरज हैं।

मुख्यधारा की राजनीति प्रारंभ-

पोस्ट ग्रेजुएशन की डिग्री प्राप्त करने के बाद श्री चंद्रशेखर समाजवादी आंदोलन में शामिल हो गए। इस दौरान उन्हें आचार्य नरेंद्र देव बहुत ज्यादा करीब से जुड़े रहने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। आचार्य नरेंद्र देव की 'प्रजा समाजवादी पार्टी' द्वारा उन्हें बलिया जिला सचिव बनाया गया और एक साल के भीतर ही वे उत्तर प्रदेश में राज्य प्रजा समाजवादी पार्टी के संयुक्त सचिव बने। कद लगातार बढ़ता गया, 1955-56 में उन्हें राज्य प्रजा समाजवादी पार्टी, उत्तरप्रदेश का महासचिव बना दिया गया।

फिर आया साल 1962, प्रजा समाजवादी पार्टी ने उन्हें उत्तर प्रदेश से ऊपरी सदन 'राज्यसभा' का सदस्य बनवा दिया। सोशलिस्ट पार्टी में टूट पड़ी तो 1965 में उन्होंने राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी ज्वाइन कर ली। साल 1967 में श्री चंद्र शेखर को कांग्रेस पार्टी द्वारा संसदीय दल के महासचिव के रूप में चुन लिया गया।

'युवा तुर्क'

संसद सदस्य बनने के बाद से ही उन्होंने दलितों के हित की दिशा में काम करना शुरू कर दिया। समाज में तेज़ी से बदलाव लाना चाहते थे इसलिए इससे जुड़ी नीतियों को निर्धारित करने पर जोर देने लगे। श्री चंद्र शेखर का मानना था कि समाज में उच्च वर्गों का गलत तरीके से एकाधिकार बढ़ रहा है। इसको लेकर उन्होंने अपनी आवाज बुलंद की तो सत्ता पर आसीन लोगों के साथ उनके बहुत ज्यादा मतभेद हुए। अपनी दृढ़ता, ईमानदारी एवं साहस के साथ निहित स्वार्थ के खिलाफ व स्वयं अपने दल के खिलाफ लड़ाई लड़ने के चलते उन्हें 'युवा तुर्क' की संज्ञा दी जाने लगी।

खुद की एक पत्रिका 'यंग इंडियन' की स्थापना की...

1969 में उन्होंने दिल्ली से प्रकाशित होने वाली एक साप्ताहिक पत्रिका ‘यंग इंडियन’ की स्थापना की व इसके प्रमुख संपादक भी बने। इस पत्रिका का सम्पादकीय उस दौर के अद्वितीय और उत्कृष्ट संपादनों में से एक हुआ करता था। देश में इमरजेंसी के दौरान, जून 1975 से मार्च 1977 तक ‘यंग इंडियन’ पत्रिका पूरी तरह बंद रही। फिर शुरू हुई लेकिन नयमित नहीं चल पाई। फरवरी 1989 से पुनः इसका नियमित प्रकाशन शुरू किया गया। श्री चंद्र शेखर इस साप्ताहिक पत्रिका के संपादकीय सलाहकार बोर्ड के अध्यक्ष रहे।

कांग्रेस छोड़ी.... कुछ वर्षों बाद सीधे प्रधानमंत्री बने

बगावती तेवर वाले चंद्र शेखर के कांग्रेस के शीर्ष नेताओं के साथ लंबे समय तक मतभेद चले। वे हमेशा ही व्यक्तिगत राजनीति के खिलाफ रहे, उनकी राजनीति हमेशा सामाजिक व वैचारिक परिवर्तनों पर ही केंद्रित रही। 1971 में उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के विरोध के बावजूद कांग्रेस की राष्ट्रीय कार्यसमिति का चुनाव लड़ा और जीते भी। अन्य नेता तो ठीक उन्होंने सीधा इंदिरा के खिलाफ ही मोर्चा खोल दिया था इसीलिए तो उन्हें 'युवा तुर्क' कहा जाता था। 1974 में भी उन्होंने इंदिरा गांधी की ‘अधीनता’ अस्वीकार करते हुए लोकनायक जयप्रकाश नारायण के आंदोलन का समर्थन किया। कांग्रेस में रहते हुए 1975 में श्री चंद्र शेखर ने इमरजेंसी के खिलाफ बढ़-चढ़ कर आवाज उठाई। इन सभी कारणों के चलते इमरजेंसी के दौरान आंतरिक सुरक्षा अधिनियम के तहत उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया था जबकि वे उस वक्त उस वक्त सत्ता में आसीन कांग्रेस पार्टी के शीर्ष निकायों, कार्य समिति व केंद्रीय चुनाव समिति के सदस्य थे। हालांकि चंद्र शेखर अकेले नहीं थे, इस अधिनियम के तहत कांग्रेस ने अपनी ही पार्टी के कई अन्य नेताओं को भी जेल में डाल दिया था।

आपातकाल के दौर में जब वे जेल में थे तब उन्होंने हिंदी में एक डायरी लिखी थी। बाद में वह डायरी ‘मेरी जेल डायरी’ के नाम से प्रकाशित हुई। राजनेता होने के साथ ही साथ वे उस दौर की प्रसिद्ध पत्रिका के संपादक भी थे। उनका लेखन तलवार की धार की तरह कटीला रहता था और बहुत ज्यादा पसंद भी किया जाता था। ‘सामाजिक परिवर्तन की गतिशीलता’ उनके लेखन के प्रसिद्द संकलनों में से एक है।

इमरजेंसी ख़त्म होने के बाद जब वे जेल से बाहर निकले तो उन्होंने विपक्षियों द्वारा बनाई गई जनता पार्टी ज्वाइन कर ली। और तो और, श्री चंद्र शेखर जनता पार्टी के पहले अध्यक्ष बने। इमरजेंसी के तुरंत बाद हुए 1977 लोकसभा चुनावों के बाद जनता पार्टी ने अन्य सहयोगी दलों की सहायता से सरकार बनाई। कांग्रेस को बुरी हार का सामना करना पड़ा। जनता पार्टी की सरकार में उन्हें मंत्री पद प्रस्तावित किया गया लेकिन उन्होंने इसे स्वीकारने से मना कर दिया। हालांकि, जनता पार्टी की सरकार ज्यादा दिन तक टिक कर नहीं चल पाई। 1980 में सातवें लोकसभा चुनाव हुए इंदिरा गांधी पुनः सत्ता में वापस आ गईं। सत्ता में आते ही इंदिरा ने स्वर्ण मंदिर पर सैनिक कार्रवाई करवा दी। उस वक्त चंद्रशेखर उन गिने-चुने नेताओं में से एक थे, जिन्होंने उस कार्रवाई का जमकर विरोध किया था।

कन्याकुमारी से नई दिल्ली तक पद यात्रा-

यह चंद्र शेखर के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण कार्य था। उन्होंने 6 जनवरी 1983 से 25 जून 1983 तक के बीच दक्षिण भारत के कन्याकुमारी के लेकर नई दिल्ली राजघाट (महात्मा गांधी के समाधि स्थल) तक पैदल यात्रा की। यह यात्रा लगभग 4260 किलोमीटर की मैराथन दूरी वाली पैदल यात्रा थी जो श्री चंद्र शेखर ने पूरी की। उनकी इस पद यात्रा का एक मात्र उद्देश्य देश के कौने-कौने के लोगों से मिलना और उनकी समस्याओं को समझना था। यह श्री चंद्र शेखर का सबसे बड़ा कदम था जिसने इंदिरा गांधी को सख्ते में डाल दिया था। इसके साथ ही उन्होंने राजनीतिक एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित करने के मकसद से कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश एवं हरियाणा समेटन देश के विभिन्न भागों में लगभग पंद्रह भारत यात्रा केंद्रों की स्थापना की थी। इन केंद्रों की मदद से वे देश के पिछड़े हुए इलाकों में लोगों को शिक्षित करना चाहते थे एवं जमीनी स्तर पर कार्य कर के लोगों की समस्याएं दूर करना चाहते थे और उन्होंने कई कार्य किए भी।

1962 से लगातार संसदीय सदस्य रहे...

श्री चंद्र शेखर का पूरा राजनीतिक जीवन विषम परिस्थितियों से जूझता रहा लेकिन वे अपने समूचे राजनीतिक जीवन काल में सिर्फ एक बार चुनाव हारे। बाकी हर चुनाव को जीता और संसद सदस्य रहे। 1984 में इंदिरा की हत्या से उपजे आक्रोश के चलते उन्हें एक बार हार का सामना करना पड़ा था। 1962 से लेकर वे अंत तक संसद सदस्य रहे, अपने ऐतिहासिक गृह क्षेत्र बलिया से 8 बार चुनाव जीते। 1989 के चुनावों में तो उन्होंने अपने गृह क्षेत्र बलिया बिहार के महाराजगंज दो जगहों से एक साथ चुनाव लड़ा और दोनों जगहों से चुनाव जीते। बाद में बिहार के महाराजगंज वाली सीट को छोड़ दिया।

न कभी मंत्री बने, ना ही मुख्यमंत्री सीधे देश के प्रधानमंत्री बने-

श्री चंद्र शेखर जी को न ही मंत्री पद संभालने का अनुभव रहा और न ही वे कभी मुख्यमंत्री बने थे। लेकिन उन्होंने सीधे देश के प्रधानमंत्री का पद संभाला।

दरअसल हुआ क्या, कि बोफोर्स घोटाले और कई भ्रष्टाचारों के चर्चा में आने के बाद राजीव गांधी सरकार सख्ते में आ गई। 1989 में लोकसभा चुनाव हुए और कांग्रेस पार्टी को हार का सामना करना पड़ा। जनता दल ने अन्य सहयोगी दलों के साथ सरकार बना ली। प्रधानमंत्री बने राजीव गांधी के सबसे बड़े विरोधी विश्वनाथ प्रताप सिंह। जनता दल की सरकार 11 महीने तक ही चल पाई फिर वी.पी. सिंह द्वारा 'मंडल आयोग' लागू करने के चलते भाजपा ने जनता दल से अपना समर्थन वापस ले लिया। दल बिखर गया, राजीव गांधी वी.पी. सिंह को फिर से प्रधानमंत्री बनते नहीं देखना चाहते थे। 64 सांसदों ने मिलकर एक अलग धड़ा बना लिया और सरकार बनाने का दावा दिया। राजीव नेतृत्व वाली कांग्रेस ने उस धड़े को फट से समर्थन दे दिया। इन 64 सांसदों धड़े के मुख्य नेता थे युवा तुर्क श्री 'चंद्र शेखर'। श्री चंद्र शेखर ने देश के नौवें प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली। हालांकि यह श्री शेखर के नेतृत्व वाली सरकार मात्र 7 महीने तक ही चली क्योंकि कुछ मतभेदों या कहें राजनीति के चलते कांग्रेस ने अपना समर्थन वापस ले लिया था। अपने 7 महीने के कार्यकाल के दौरान उन्होंने प्रधानमंत्री रहते हुए डिफेन्स और होम अफेयर्स की जिम्मेदारियों को भी संभाला था।

प्रधानमंत्री बनकर उन्होंने कई कीर्तिमान रचे उनमें से एक यह भी था- श्री चंद्र शेखर भारत के समाजवादी आंदोलन से निकली इकलौती ऐसी शख्सियत हैं, जिन्हें प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठने सौभाग्य प्राप्त हुआ।

फ्लो-फ्लो में नहीं लिख रहा हूं, इतने प्रखर वक्ता थे कि जनता सन्न होकर सुनती थी!

श्री चंद्र शेखर जब जनसभाएं करते थे और अपना वक्तव्य देते थे तो जनता उनकी दीवानी हो जाती थी। जनसभाएं तो छोड़िए, श्री चन्द्रशेखर उनके संसदीय वार्तालाप के लिए बहुत चर्चित थे। जो वे संसद में बोला करते थे उन वक्तव्यों की महीनों सालों तक चर्चा हुआ करती थी। उनकी कही कई बातें तो राजनीतिक मुहावरे बन जाती थीं। इसी के चलते 1994 में उन्हें आउटस्टैण्डिंग पार्लिमेन्टेरियन अवार्ड से भी सम्मानित किया गया था।

देश की राजनीति को करीब आधी शताब्दी तक प्रभावित करने वाले श्री चंद्र शेखर ने एक बार कहा था कि "यह देश का दुर्भाग्य है कि उसके ज्यादातर लीडर डीलरों का रूप धारण कर रहे हैं। ऐसा कोई नहीं जो अलोकप्रियता का खतरा उठाकर जनता को सच्चा नेतृत्व देना चाहता हो।" मतलब सब लालची, स्वार्थी हो जाते हैं। उन्होंने अपने बेटों को भी विरासत के तौर पर कुछ नहीं दिया, सिर्फ एक चीज़ के अलावा। एक किस्सा प्रचलित है, जब श्री चंद्र शेखर के बेटे ने उनसे पूछा कि आप हमें क्या देकर जा रहे हैं तो उन्होंने अपने एक चौकीदार को बुलाया और पूछा कि तुम्हारे पिता जी का क्या नाम है? उसने बताया। फिर चंद्र शेखर ने अपने बेटे से पूछा, क्या तुम इनके पिता जी को जानते हो? बेटा बोला, नहीं। श्री चंद्र शेखर ने कहा मैं बस तुम्हें यही देकर जाऊंगा, जब तुमसे कोई तुम्हारे बाप का नाम पूछेगा तो तुम्हें बताना नहीं पड़ेगा कि वो कौन थे, उन्हें सब पहले से ही जानते होंगे। बेटे के पास इसका कोई भी जवाब नहीं था।

मल्टिपल मायलोमा, एक प्रकार का प्लाज्मा कोष कैंसर होता है जिसने श्री चंद्र शेखर को अपने लपेटे में ले लिया था। इसी रोग के चलते 3 मई, 2007 को उन्हें गंभीर अवस्था में अस्पताल में भर्ती कराया गया। हालत लगातार बिगड़ती गई, लगभग दो महीने बाद, 8 जुलाई को नई दिल्ली के एक अस्पताल में उनके प्राणों ने देह को त्याग दिया।

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