

फ्रांस के खूबसूरत शहर एवियां में आयोजित G7 Summit 2026 भारत के लिए सिर्फ एक अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम नहीं था। यह वह मंच था, जहां भारत ने दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच अपनी बढ़ती ताकत, आर्थिक महत्व और वैश्विक प्रभाव का प्रदर्शन किया।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दो दिनों तक लगातार व्यस्त रहे। उन्होंने अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर, कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी, जर्मनी के चांसलर फ्रेडरिक मर्ज़, यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन, यूएई के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद और यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर ज़ेलेंस्की सहित कई नेताओं से मुलाकात की।
इन बैठकों से साफ संदेश गया कि आज दुनिया के बड़े आर्थिक, तकनीकी और रणनीतिक मुद्दों पर भारत की भूमिका पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो चुकी है।
G7 दुनिया की सात प्रमुख विकसित अर्थव्यवस्थाओं का समूह है, जिसमें अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, कनाडा, इटली और जापान शामिल हैं।
भारत इसका सदस्य नहीं है, फिर भी पिछले कई वर्षों से उसे लगातार आमंत्रित किया जा रहा है।
कारण साफ है।
भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। यह एक विशाल उपभोक्ता बाजार है, वैश्विक सप्लाई चेन का उभरता केंद्र है और विकासशील देशों की आवाज़ के रूप में भी अपनी पहचान बना चुका है।
आज जलवायु परिवर्तन से लेकर व्यापार, ऊर्जा, तकनीक और सुरक्षा तक, ऐसे बहुत कम मुद्दे हैं जिन पर भारत को नजरअंदाज करके वैश्विक सहमति बनाई जा सके।
G7 के विशेष सत्र में प्रधानमंत्री मोदी ने दुनिया के नेताओं के सामने भारत का दृष्टिकोण रखा।
उन्होंने कहा कि विकास को केवल GDP और व्यापार के आंकड़ों से नहीं मापा जाना चाहिए। असली सवाल यह है कि विकास का लाभ किसे मिल रहा है और कितने लोग उसमें शामिल हैं।
उन्होंने भारत के विकास मॉडल का जिक्र करते हुए कहा कि "सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास, सबका प्रयास" सिर्फ देश के लिए नहीं बल्कि वैश्विक सोच का भी आधार है।
प्रधानमंत्री मोदी ने यह भी कहा कि पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष, सप्लाई चेन में व्यवधान और ऊर्जा संकट का सबसे ज्यादा असर विकासशील देशों पर पड़ता है। इसलिए दुनिया को ऐसे समाधान तलाशने होंगे जो सभी देशों को साथ लेकर चलें।
G7 Summit में प्रधानमंत्री मोदी ने एक नई पहल का सुझाव दिया, जिसका नाम है IMPACT — International Mobilisation Partnership for Accelerating Connectivity and Trade.
इसका उद्देश्य है कि G7 देशों की पूंजी, भारत की प्रतिभा और विकासशील देशों की भागीदारी को जोड़कर नए व्यापारिक और कनेक्टिविटी कॉरिडोर विकसित किए जाएं।
प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और प्रशांत क्षेत्र के देशों को भी वैश्विक आर्थिक नेटवर्क से बेहतर तरीके से जोड़ा जाना चाहिए।
यह प्रस्ताव दिखाता है कि भारत अब केवल वैश्विक परियोजनाओं में भाग लेने वाला देश नहीं, बल्कि नए वैश्विक ढांचे का प्रस्ताव देने वाला देश बन चुका है।
भारत ने एक बार फिर India-Middle East-Europe Economic Corridor (IMEC) को आगे बढ़ाने की बात की।
यह परियोजना भारत, मध्य पूर्व और यूरोप को जोड़ने वाली एक महत्वपूर्ण व्यापारिक और लॉजिस्टिक पहल है।
भारत का मानना है कि भविष्य की आर्थिक प्रतिस्पर्धा केवल उत्पादन पर नहीं बल्कि बेहतर कनेक्टिविटी, तेज सप्लाई चेन और सुरक्षित व्यापार मार्गों पर निर्भर करेगी।
G7 के दौरान IMEC को एक ऐसे मॉडल के रूप में पेश किया गया जिसे दुनिया के दूसरे क्षेत्रों में भी अपनाया जा सकता है।
पूरे सम्मेलन की सबसे चर्चित मुलाकात प्रधानमंत्री मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच हुई।
पिछले कुछ समय से दोनों देशों के बीच व्यापार, टैरिफ, वीजा और कुछ रणनीतिक मुद्दों को लेकर मतभेद देखने को मिले थे। ऐसे में यह मुलाकात बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही थी।
बैठक के दौरान दोनों नेताओं ने व्यापार, रक्षा, ऊर्जा, तकनीक और क्षेत्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों पर चर्चा की।
ट्रंप ने प्रधानमंत्री मोदी को "टफ नेगोशिएटर" बताया और कहा कि भारत तथा अमेरिका के संबंध बेहद मजबूत हैं।
उन्होंने भारत आने की इच्छा भी जताई और कहा कि दोनों देश एक महत्वपूर्ण व्यापार समझौते के बेहद करीब पहुंच चुके हैं।
बैठक का सबसे बड़ा नतीजा भारत-अमेरिका ट्रेड डील पर हुई प्रगति रही।
दोनों देशों ने माना कि बातचीत में महत्वपूर्ण प्रगति हुई है।
अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जैमीसन ग्रीयर अगले सप्ताह भारत आने वाले हैं, जिससे संकेत मिलता है कि समझौता अंतिम चरण में पहुंच चुका है।
यदि यह डील पूरी होती है तो इससे व्यापार, निवेश, मैन्युफैक्चरिंग, टेक्नोलॉजी और सप्लाई चेन सहयोग को बड़ा बढ़ावा मिल सकता है।
हाल ही में ओमान के पास अमेरिकी सैन्य कार्रवाई में तीन भारतीय नाविकों की मौत ने भारत में चिंता पैदा की थी।
प्रधानमंत्री मोदी ने ट्रंप से मुलाकात के दौरान इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाया।
उन्होंने कहा कि दुनिया भर में लाखों भारतीय नाविक समुद्री व्यापार का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं और उनकी सुरक्षा भारत के लिए सर्वोच्च प्राथमिकता है।
उन्होंने यह भी कहा कि समुद्री व्यापार मार्ग सुरक्षित रहना दुनिया की अर्थव्यवस्था के लिए जरूरी है।
पश्चिम एशिया में चल रहे तनाव के कारण Strait of Hormuz इस सम्मेलन के प्रमुख विषयों में शामिल रहा।
दुनिया के तेल व्यापार का बड़ा हिस्सा इसी समुद्री मार्ग से गुजरता है।
भारत अपनी तेल जरूरतों का लगभग 90 प्रतिशत आयात करता है। ऐसे में यदि इस क्षेत्र में तनाव बढ़ता है तो उसका सीधा असर भारत की अर्थव्यवस्था, ऊर्जा कीमतों और महंगाई पर पड़ सकता है।
इसी वजह से भारत ने समुद्री व्यापार को बिना रुकावट जारी रखने और नौवहन की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने पर जोर दिया।
G7 Summit के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन और यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंटोनियो कोस्टा से मुलाकात की।
दोनों पक्षों ने भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते (FTA) पर हुई प्रगति का स्वागत किया।
यूरोपीय नेतृत्व ने संकेत दिया कि इस वर्ष के अंत तक समझौते पर हस्ताक्षर हो सकते हैं।
यह भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि यूरोपीय संघ दुनिया के सबसे बड़े व्यापारिक बाजारों में से एक है।
यह समझौता भारतीय निर्यात, निवेश और सप्लाई चेन विविधीकरण के लिए नए अवसर पैदा कर सकता है।
ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर के साथ बैठक में दोनों देशों ने घोषणा की कि भारत-यूके Comprehensive Economic and Trade Agreement 15 जुलाई 2026 से लागू होगा।
यह समझौता भारतीय MSMEs, किसानों, स्टार्टअप्स, नवाचार क्षेत्र और निर्यातकों के लिए नए अवसर लेकर आएगा।
कई वर्षों की बातचीत के बाद अब यह समझौता वास्तविक रूप से लागू होने जा रहा है।
एक समय ऐसा था जब भारत और कनाडा के संबंध अपने सबसे कठिन दौर में थे।
खालिस्तानी अलगाववादी हरदीप सिंह निज्जर की हत्या को लेकर हुए विवाद ने दोनों देशों के रिश्तों को गहरा नुकसान पहुंचाया था।
लेकिन G7 Summit में प्रधानमंत्री मोदी और कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी की मुलाकात ने बदलती तस्वीर दिखाई।
दोनों देशों ने रक्षा और सुरक्षा सहयोग को मजबूत करने के लिए General Security of Information Agreement (GSOIA) पर बातचीत शुरू करने का फैसला किया।
इसके अलावा Comprehensive Economic Partnership Agreement (CEPA) पर भी सकारात्मक प्रगति की समीक्षा की गई।
यदि बातचीत सफल रहती है तो प्रधानमंत्री मोदी इस वर्ष कनाडा का दौरा भी कर सकते हैं।
प्रधानमंत्री मोदी ने जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज़ के साथ व्यापार, रक्षा, हरित विकास, शिक्षा और तकनीक पर चर्चा की।
दोनों देशों ने भारत-जर्मनी रणनीतिक साझेदारी को और मजबूत करने पर सहमति जताई।
वहीं यूएई के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद के साथ प्रधानमंत्री मोदी की यह इस वर्ष की तीसरी मुलाकात थी।
ऊर्जा, निवेश और तकनीक के क्षेत्र में भारत-यूएई सहयोग लगातार मजबूत होता दिखाई दे रहा है।
G7 Summit में कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी AI पर विशेष चर्चा हुई।
प्रधानमंत्री मोदी ने दुनिया के प्रमुख नेताओं और टेक कंपनियों के प्रमुखों के साथ AI के सुरक्षित और जिम्मेदार उपयोग पर चर्चा की।
भारत ने स्पष्ट किया कि वह केवल तकनीक का उपभोक्ता नहीं बल्कि वैश्विक डिजिटल नवाचार का प्रमुख केंद्र बनना चाहता है।
G7 Summit के बाद प्रधानमंत्री मोदी पेरिस पहुंचे, जहां वे फ्रांसीसी राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के साथ VivaTech 2026 में भाग लेंगे।
यह यूरोप का सबसे बड़ा स्टार्टअप और टेक्नोलॉजी सम्मेलन माना जाता है।
इस वर्ष भारत का सबसे बड़ा राष्ट्रीय पवेलियन वहां मौजूद है, जो भारत के बढ़ते स्टार्टअप और इनोवेशन इकोसिस्टम को दर्शाता है।
यदि पूरे सम्मेलन को भारत के नजरिए से देखा जाए तो सबसे बड़ी उपलब्धियां थीं:
अमेरिका के साथ ट्रेड डील को अंतिम चरण तक पहुंचाना
ब्रिटेन के साथ समझौते की कार्यान्वयन तिथि तय होना
यूरोपीय संघ के साथ FTA पर निर्णायक प्रगति
कनाडा के साथ रिश्तों में उल्लेखनीय सुधार
ऊर्जा सुरक्षा और समुद्री व्यापार पर भारत की चिंताओं को वैश्विक मंच पर रखना
ग्लोबल साउथ की आवाज़ के रूप में अपनी भूमिका को और मजबूत करना
AI, टेक्नोलॉजी और कनेक्टिविटी पर भविष्य की दिशा प्रस्तुत करना
एवियां में आयोजित G7 Summit 2026 ने एक बार फिर साबित किया कि भारत अब केवल दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाला देश या तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था नहीं है।
आज भारत उन चुनिंदा देशों में शामिल हो चुका है जिनकी भागीदारी के बिना व्यापार, ऊर्जा, तकनीक, सप्लाई चेन और वैश्विक विकास जैसे विषयों पर कोई भी बड़ी चर्चा अधूरी मानी जाती है।
फ्रांस में हुए इस सम्मेलन ने दिखाया कि भारत अब वैश्विक एजेंडा का हिस्सा भर नहीं है, बल्कि उसे आकार देने वाले देशों में भी शामिल हो चुका है।