देशद्रोही को क्या सजा मिलती है? कानून को समझिये।

देशद्रोही को क्या सजा मिलती है? कानून को समझिये।

Ashish Urmaliya ||Pratinidhi Manthan

बैंगलुरुकी एक छात्रा अमूल्या लियोना के खिलाफ देशद्रोह का मामला दर्ज कर हिरासत में ले लियागया है। असद्दुदीन ओवैसी द्वारा आयोजित रैली में उसने पाकिस्तान के समर्थन में नारालगाया था। तो अब उसके ऊपर देशद्रोह का केस दर्ज हो गया है।  

तो आइये जानते हैं, देशद्रोहका कानून क्या होता है?

यहकानून अंग्रेजों के जमाने में बनाया गया था, कई बार इस कानून को लेकर सवाल उठाये गए.वक्त-वक्त पर इस कानून को लेकर बहस भी होती रही है, साल 2019 के लोकसभा चुनावों मेंकांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में देशद्रोह कानून को वापस लेने की बात भी कही थी। कांग्रेसने वादा किया था, कि अगर उनकी सरकार बनती है तो वो देशद्रोह कानून को ख़त्म कर देंगे।   

इंडियनपीनल कोड की धारा 124ए में इसको परिभाषित किया गया है, 124 ए के मुताबिक किसी भी तरहके मौखिक या लिखित शब्दों, चिन्हों के जरिए प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से नफरत फैलानेया असंतोष जाहिर करने पर देशद्रोह का मुकदमा दर्ज किया जाता है। आईपीसी की धारा124ए विश्वासघात, असंतोष और घृणा को भी खुद में शामिल करती है।

धारायह भी कहती है, कि अगर कोई भी बयान सरकार या सरकार द्वारा उठाये गए कदम का विरोध करताहै तो वह बयान देशद्रोह के दायरे में नहीं आएगा, जब तक कि उस बयान से नफरत या घृणाका वातावरण न बनता हो।

सजा का क्या प्रावधान है?

आजादीके पहले बहुत ज्यादा लोगों को इस कानून के अंतर्गत सजा दी जाती थी, लेकिन आजादी केबाद से इस कानून के अंतर्गत सजा पाने वाले मामले बहुत ही कम हैं। अब अधिकतर लोगों परदेशद्रोह का आरोप साबित नहीं हो पाता।

हालांकिदेशद्रोह का कानून बेहद सख्त है, इसमें किसी को भी गिरफ्तार करने के लिए वारंट की जरूरतनहीं पड़ती। इसमें आरोपी पीड़ित पक्ष के साथ किसी भी तरह का कोई समझौता नहीं कर सकता।यह कानून गैरजमानती अपराध के अंतर्गत आता है। इस कानून के तहत आरोप सिद्ध होने पर3 साल से लेकर उम्रकैद तक की सजा का प्रावधान है। इसके साथ ही इसमें जुर्माने का भीप्रावधान है।

–देशद्रोह के मुक़दमे में आरोपी को अपना पासपोर्ट भी सरेंडर करना पड़ता है। वह किसी भीतरह की सरकारी नौकरी नहीं कर पाता, उसे बार-बार कोर्ट के सामने हाजिर होना पड़ता है। 

भारत में शुरुआत कबसे हुई?

यहअंग्रेजों के दौर का कानून है। 1870 से पहले भारत में इंडियन पीनल कोड नहीं हुआ करताथा, इसके भी 10 साल पहले ही यानी 1860 में अंग्रेजी हुकूमत ने इसको लेकर मसौदा तैयारकर लिया था। फिर 10 बाद यानी1870 में इस कानून को भारतीय कानून संहिता(IPC) की धारा124ए की शक्ल दे दी गई। अंग्रेजी हुकूमत ने इस कानून को उनका विरोध करने वाली जनताके लिए बनाया था, ताकि ब्रिटिश हुकूमत का विरोध करने वालों को कुचला जाए विद्रोहियोंको जेल में डाला जा सके और अंग्रेजो के खिलाफ कोई चूं तक न कर सके।

पहला मुकदमा-

आईपीसीकी धारा 124ए के अंतर्गत पहला मुकदमा साल 1891 में दर्ज किया गया था। उस वक्त बंगोबासीनाम का एक अखबार प्रकाशित हुआ करता था उसके एडिटर पर आरोप लगाया गया था कि उसने अपनेएक लेख में 'एज ऑफ कंसेट बिल' की आलोचना की थी। हालांकि इस मुक़दमे में जूरी किसी एकनतीजे पर नहीं पहुंच पाई थी और एडिटर जमानत पर रिहा हो गए थे। एक माफीनामे के बाद उनपर लागए गए आरोप भी वापस ले लिए गए थे।

दूसरा मुकदमा-

साल1897 में बालगंगाधर तिलक को देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार किया गया था, अंग्रेजी हुकूमतने बाल पर आरोप लगाया था, कि उनके भाषणों की वजह से पुणे में दो अंग्रेज अफसरों कीहत्या कर दी गई है। दरअसल, बाल गंगाधर तिलक ने उस वक्त अपने भाषण में अफजल खान के मारेजाने का जिक्र किया था। हालांकि एक साल बाद तिलक को रिहा कर दिया गया था। उसके बादएक बार फिर तिलक को देशद्रोह का आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया था। इस बार उनके अखबारकेसरी में छपे एक आर्टिकल का मामला था, इस बार तिलक को 6 साल जेल में बिताने पड़े थे।

फिरआया साल 1942 जब 'भारत छोड़ो आंदोलन' तेजी पकड़ चुका था, तब इस कानून की परिभाषा मेंबदलाव किया गया। अब जनता का सरकार के खिलाफ असंतोष जाहिर करना देशद्रोह नहीं माना जासकता था। देशद्रोह उसी स्थिति में माना जा सकता था, जब इस असंतोष में कानून व्यवस्थाको बिगाड़ने और हिंसा भड़काने की भी अपील शामिल हो। 

आजादीमिलने के बाद देशद्रोह का जो सबसे अहम मुकदमा माना जाता है वह था, बिहार के केदारनाथसिंह का मुकदमा। साल 1962 में बिहार सरकार ने केदारनाथ पर देशद्रोही भाषण देने के मामलेमें देशद्रोह का केस दर्ज किया था। इस केस पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी थी। इसकेबाद बिहार सरकार मुकदमे को लेकर हाई कोर्ट पहुंची, तब कोर्ट ने कहा था, कि देशद्रोहके आरोप में ऐसे भाषणों पर तभी सजा हो सकती है जब इसकी वजह से किसी तरह की हिंसा हुईहो या फिर असंतोष बढ़ा हो।

Pratinidhi Manthan
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