महाराष्ट्र की राजनीति में लोकप्रियता अक्सर क्षणिक होती है, लेकिन सत्ता की पकड़ स्थायी।
Ajit Pawar उन नेताओं में थे जिन्होंने जनभावनाओं से अधिक संस्थागत नियंत्रण को समझा—और उसी समझ के सहारे दशकों तक सत्ता के केंद्र में बने रहे।
28 जनवरी 2026 को बारामती के पास हुए विमान हादसे में उनका निधन केवल एक राजनीतिक जीवन का अंत नहीं था। यह उस शैली की राजनीति का भी अंत था, जो भाषणों से नहीं, बल्कि फ़ाइलों, फैसलों और नेटवर्क से चलती थी।
यह लेख श्रद्धांजलि नहीं, बल्कि अजित पवार की राजनीति का विश्लेषण है—वे कैसे बने, कैसे टिके, कैसे टूटे और उनके जाने के बाद महाराष्ट्र की राजनीति किस दिशा में जा सकती है।
अजित पवार का जन्म 22 जुलाई 1959 को अहमदनगर ज़िले के देवलाली प्रवरा में हुआ। पवार परिवार पहले से ही पश्चिमी महाराष्ट्र की राजनीति का एक स्तंभ था। शरद पवार की राजनीतिक ऊँचाई ने यह मान लेना आसान बना दिया कि अजित पवार को सत्ता विरासत में मिली।
हक़ीक़त इससे अलग थी।
अजित पवार की राजनीति संसद से नहीं, सहकारिता तंत्र से शुरू हुई—वहीं से, जहाँ महाराष्ट्र में वास्तविक शक्ति आकार लेती है।
चीनी मिलें, सहकारी बैंक, सिंचाई समितियाँ—ये संस्थान केवल आर्थिक नहीं, राजनीतिक नियंत्रण के औज़ार भी हैं।
1982 में सहकारी चीनी मिल के बोर्ड में प्रवेश और 1991 में पुणे ज़िला केंद्रीय सहकारी बैंक की अध्यक्षता ने उन्हें वह प्रशिक्षण दिया, जो किसी राजनीतिक अकादमी से नहीं मिल सकता था।
यहीं से उनकी राजनीति की रीढ़ बनी:
कम शब्द, ज़्यादा आदेश।
कम भावनाएँ, ज़्यादा सिस्टम।
बारामती सिर्फ़ एक विधानसभा क्षेत्र नहीं रहा—वह अजित पवार की राजनीतिक प्रयोगशाला था।
1991 से 2024 तक, सात बार विधानसभा चुनाव जीतना संयोग नहीं था।
सड़कें, सिंचाई, शिक्षा, सहकारी संस्थाएँ—सब एक केंद्रीकृत ढांचे के भीतर काम करती थीं।
समर्थकों के लिए यह विकास का मॉडल था।
आलोचकों के लिए सत्ता का संकेंद्रण।
लेकिन लोकतंत्र में अंतिम फैसला मतदाता करता है—और बारामती ने बार-बार अजित पवार को चुना।
अजित पवार वैचारिक नेता नहीं थे।
उन्होंने न तो किसी बड़े आंदोलन का नेतृत्व किया, न ही राजनीतिक दर्शन गढ़ा।
उनकी राजनीति प्रशासनिक दक्षता पर आधारित थी।
जल संसाधन, सिंचाई, ग्रामीण विकास, योजना, वित्त—ये मंत्रालय महाराष्ट्र की राजनीति में शक्ति के वास्तविक स्रोत हैं।
अजित पवार ने इन्हें न केवल संभाला, बल्कि इन पर अपनी कार्यशैली की छाप छोड़ी।
छह बार उपमुख्यमंत्री बनना इस बात का प्रमाण है कि सत्ता पक्ष, चाहे कोई भी हो, उन्हें नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता था।
इतनी शक्ति विवादों के बिना नहीं आती।
सिंचाई परियोजनाओं और लवासा जैसे विकास प्रोजेक्ट्स पर लगे आरोपों ने उन्हें लगातार सवालों के घेरे में रखा।
2012 में कथित सिंचाई घोटाले के आरोप लगे—कानूनी रूप से कोई निर्णायक दोष सिद्ध नहीं हुआ, लेकिन राजनीतिक बहस बनी रही।
2013 में सूखे के दौरान दिया गया एक असंवेदनशील बयान उनकी सार्वजनिक छवि पर भारी पड़ा। उन्होंने माफी माँगी, लेकिन यह दिखाता है कि सत्ता में लंबे समय तक रहने से भाषा कितनी कठोर हो सकती है।
2024 में पुणे के एक सड़क हादसे में पुलिस पर दबाव डालने के आरोप लगे। उन्होंने हस्तक्षेप से इनकार किया, लेकिन आलोचना तेज़ हुई।
फिर भी एक तथ्य निर्विवाद रहा:
विवाद उनकी सत्ता को निर्णायक रूप से कभी नहीं तोड़ पाए।
नवंबर 2019 में भाजपा के साथ अचानक शपथ लेना और कुछ ही दिनों में सरकार गिर जाना उस समय एक राजनीतिक चूक माना गया।
लेकिन पीछे मुड़कर देखें तो यह एक संकेत था—
अजित पवार अब शरद पवार की परछाईं में सीमित नहीं रहना चाहते थे।
2023 का एनसीपी विभाजन आधुनिक महाराष्ट्र राजनीति की सबसे निर्णायक घटनाओं में से एक था।
अधिकांश विधायकों के साथ पार्टी तोड़ना और फिर चुनाव आयोग से पार्टी का नाम व चुनाव चिह्न हासिल करना—यह केवल राजनीतिक चाल नहीं थी, यह संस्थागत अधिग्रहण था।
यह कदम उन्हें सत्ता के और करीब ले गया, लेकिन नैतिक बहस को और गहरा कर गया।
यह टकराव चाचा-भतीजे का नहीं था—
यह राजनीति को देखने के दो तरीकों की टकराहट थी।
अजित पवार को वर्षों तक “भावी मुख्यमंत्री” कहा गया।
लेकिन वे कभी मुख्यमंत्री नहीं बने।
शायद इसलिए कि उपमुख्यमंत्री की भूमिका में वे सत्ता चलाते थे, लेकिन अंतिम जिम्मेदारी से बचे रहते थे।
यही स्थिति उन्हें ताक़त देती थी—और सीमित भी करती थी।
28 जनवरी 2026 को वे मुंबई से बारामती जा रहे थे।
स्थानीय चुनाव, सार्वजनिक कार्यक्रम—एक सामान्य राजनीतिक दिन।
लेकिन लैंडिंग के दौरान विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया।
पाँच लोगों की मृत्यु हुई, जिनमें अजित पवार भी शामिल थे।
शरद पवार ने तुरंत अपील की—इसे राजनीति का विषय न बनाया जाए।
महाराष्ट्र ने तीन दिन का राजकीय शोक मनाया।
अजित पवार के जाने से केवल एक नेता नहीं गया—
एक सत्ता-संरचना कमजोर हुई है।
अब सवाल खुले हैं:
क्या उनका राजनीतिक तंत्र उनके बिना टिक पाएगा?
क्या बारामती की राजनीति बदलेगी?
और क्या महाराष्ट्र की सत्ता अब वैचारिक राजनीति की ओर लौटेगी, या किसी नए पावर-ब्रॉकर की प्रतीक्षा करेगी?
इतिहास शायद उन्हें महान आदर्शवादी न माने।
लेकिन वह उन्हें एक ऐसे राजनेता के रूप में ज़रूर याद रखेगा,
जिसने सत्ता को समझा—और उसे अंत तक साधे रखा।