यहां के किसान अब खेती नहीं करते साबुन बनवाते हैं, वो भी बकरी के दूध का

यहां के किसान अब खेती नहीं करते साबुन बनवाते हैं, वो भी बकरी के दूध का

AshishUrmaliya || Pratinidhi Manthan

महाराष्ट्रके सुखाड़ इलाके (बारिश कम होने की वजह से जहां खेती-बाड़ी की कुछ खास संभावनाएं नहींहोती) के किसान बकरियों के दूध से अपनी तकदीर बना रहे हैं। कहते हैं न कि 'उसने पेटलगा कर भेजा है, तो खाने को भी देगा।' बस ऐसा ही कुछ हुआ है महाराष्ट्र के उस्मानाबादजिले के किसानों के साथ। एक वक्त हुआ करता था जब यहां के अधिकतर किसान गरीबी के चलतेआत्महत्या कर लेते थे व बहुत बुरे दौर से गुजर रहे थे। लेकिन अब समय बदल चुका है औरयह समय बदला है स्थानीय नस्ल की  'उस्मानाबादीबकरी' ने।

25 गांव के परिवारों की रोजी-रोटीचल रही है-

जिलेके करीब 25 गांवों के परिवार बकरी के दूध से साबुन बना कर पैसे कमा रहे हैं। और इसकाम में उन किसानों की मदद कर रही है स्वयंसेवी संस्था 'शिवार'। इस संस्थाके सीईओ विनायक हेगाना के अनुसार, उन्होंने यहां के किसानों को सीधी आर्थिक मदद देनेकी वजाय आजीविका चलाने का गुर सिखाने का फैसला लिया। और किसानों को बताया, कि कैसेउस्मानाबादी बकरियों को पालकर मुनाफा कमाया जा सकता है।

असल में होता क्या है?

शिवारद्वारा किसानों को उस्मनाबादी बकरियों को पालने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। मात्रएक लीटर बकरी के दूध के लिए किसानों को 300 रूपए दिए जाते हैं और एक दिन के काम का150 रुपया दिया जाता है। इस काम में 250 परिवार और उनकी 1400 बकरियां शामिल हैं। संस्थाइस परियोजना में 10,000 और परिवारों को जोड़ने की योजना बना रही है।

उस्मनाबादी बकरी में ऐसा क्याहै?

उस्मानाबादीबकरियों के दूध में विटामिन ए, ई, सेलेनियम और अल्फ़ा हाइड्रोक्सी अम्ल की मात्रा भरपूरहोती है, जो त्वचा के रोगों के इलाज में बेहतर है।इन बकरियों का प्रयोग दूध और मांसदोनों के लिए होता है। इस नस्ल की मछली सिर्फ महाराष्ट्र में पाई जाती है। उस्मनाबादीबकरी आमतौर पर साल में 2 बार प्रजनन करती है और इस नस्ल की मृत्यु-दर भी बहुत कम है।समान्य तौर पर जिन बकरियों को पाला जाता है, वे 'जमुनापारी नस्ल' की होती हैं। ये बकरियांसिर्फ दूध के मामले में बेहतर होती हैं और इनकी मृत्युदर भी अधिक होती है।

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